उम्र बढ़ने के साथ कमर से पैरों तक दर्द और झनझनाहट कई लोगों की परेशानी बन जाती है. इसकी एक आम वजह लंबर स्पाइनल स्टेनोसिस है. अब स्पाइनल स्टेनोसिस नई रिसर्च में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसकी जड़ में एक खास स्टेम सेल पहचानी है. यह स्टडी सितंबर 2026 में Cell जर्नल में छपी है.
स्पाइनल स्टेनोसिस नई रिसर्च में क्या मिला
अमेरिका के हॉस्पिटल फॉर स्पेशल सर्जरी (HSS) और वील कॉर्नेल मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने टेंडन और लिगामेंट बनाने वाली एक नई स्टेम सेल खोजी है. स्टेनोसिस मरीज़ों के लिगामेंट में ये कोशिकाएं ज़्यादा मिलीं. इनमें कैल्शियम सिग्नलिंग भी बढ़ी हुई थी. चूहों में यह सिग्नलिंग घटाने पर ऊतक का ज़्यादा बढ़ना रुक गया.
Cell जर्नल में छपी इस स्पाइन स्टडी की अहम बातें
- प्रकाशन: Cell जर्नल, 7 सितंबर 2026.
- टीम: डॉ. मैथ्यू ग्रीनब्लाट, डॉ. श्रविष्ट अय्यर और पहली लेखक डॉ. लिंगलिंग हू.
- खोज: टेंडन और लिगामेंट की सभी तरह की कोशिकाएं बनाने वाली स्टेम सेल.
- जांच का आधार: सर्जरी में लिए गए मरीज़ों के लिगामेंट सैंपल और चूहों पर प्रयोग.
- आगे की राह: BP में दी जाने वाली कैल्शियम चैनल ब्लॉकर दवाओं पर क्लिनिकल ट्रायल की ज़रूरत.
स्पाइनल स्टेनोसिस होता क्या है
अमेरिकी सरकारी संस्थान NIAMS के मुताबिक रीढ़ के भीतर की जगह संकरी होने से स्पाइनल कॉर्ड और नसों पर दबाव पड़ता है. इसी को स्पाइनल स्टेनोसिस कहते हैं. आमतौर पर यह कमर और गर्दन वाले हिस्से में होता है. HSS के मुताबिक दुनिया में करीब 10.3 करोड़ लोग लंबर स्पाइनल स्टेनोसिस से प्रभावित हैं.
इसकी मुख्य वजह उम्र के साथ होने वाले बदलाव हैं. उदाहरण के लिए रीढ़ के लिगामेंट मोटे और सख्त हो सकते हैं. इसके अलावा गठिया, हड्डी का उभार यानी बोन स्पर और डिस्क का खिसकना भी वजह बन सकते हैं. मेयो क्लिनिक के मुताबिक ज़्यादातर मरीज़ 50 साल से ज़्यादा उम्र के होते हैं.
किन लक्षणों पर ध्यान दें
NIAMS के मुताबिक कमर से कूल्हों और पैरों तक जलन भरा दर्द हो सकता है. साथ ही सुन्नपन, झनझनाहट या पैरों में कमज़ोरी भी महसूस हो सकती है. खास बात यह है कि ये लक्षण खड़े होने या चलने पर बढ़ते हैं. वहीं आगे झुकने या बैठने पर आराम मिलता है. हालांकि मेयो क्लिनिक बताता है कि कई लोगों में कोई लक्षण नहीं होते.
ध्यान रहे, पेशाब या मल पर काबू में दिक्कत आए तो इसे गंभीर संकेत मानें. ऐसे में देर किए बिना अस्पताल जाएं.
स्टेम सेल और कैल्शियम का कनेक्शन
टीम ने सर्जरी के दौरान मरीज़ों की सहमति से लिगामेंट के सैंपल लिए. फिर स्टेनोसिस मरीज़ों की तुलना डिस्क हर्निएशन वाले मरीज़ों से की गई. स्टेनोसिस वालों के लिगामेंट में नई स्टेम सेल ज़्यादा संख्या में मिलीं.
इसके बाद इन कोशिकाओं को चूहों में ट्रांसप्लांट किया गया. स्टेनोसिस वाली कोशिकाओं ने स्वस्थ कोशिकाओं से ज़्यादा टेंडन कोशिकाएं बनाईं. जांच में इनमें कैल्शियम सिग्नलिंग भी ज़्यादा मिली. यानी कोशिका के भीतर कैल्शियम के ज़रिए चलने वाला संदेश तंत्र ज़्यादा सक्रिय था.
फिर वैज्ञानिकों ने स्वस्थ कोशिकाओं में जेनेटिक तरीके से यह सिग्नलिंग बढ़ाई. तो ऊतक ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ने लगा. वहीं चूहों के स्टेनोसिस मॉडल में सिग्नलिंग घटाने पर यह बढ़त रुक गई.
BP की दवा वाली बात कितनी पक्की है
कैल्शियम चैनल ब्लॉकर दवाएं हाई ब्लड प्रेशर में पहले से दी जाती हैं. HSS के मुताबिक इन्हें स्टेनोसिस के संभावित इलाज के तौर पर परखा जा सकता है. लेकिन यह अभी सिर्फ एक संभावना है. इसके लिए इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल होने बाकी हैं.
इसलिए साफ समझ लें कि कमर दर्द के लिए BP की दवा अपने मन से बिल्कुल शुरू न करें. ये दवाएं ब्लड प्रेशर पर असर डालती हैं और डॉक्टर की निगरानी में ही ली जाती हैं. पहले से कोई दवा चल रही हो, तो उसे भी खुद से न बदलें.
स्पाइनल स्टेनोसिस नई रिसर्च की सीमाएं
सबसे पहले, दवा से जुड़ा नतीजा चूहों के मॉडल से आया है. इंसानों में वही असर होगा, यह अभी साबित नहीं है. इसके अलावा मरीज़ों के सैंपल उन लोगों से लिए गए, जिनकी सर्जरी हो रही थी. ऐसे में शुरुआती या हल्के मामलों के बारे में यह स्टडी अभी ज़्यादा नहीं बताती. फिलहाल गंभीर मामलों में सर्जरी ही मुख्य विकल्प बनी हुई है.
मरीज़ अभी क्या करें
अगर लंबे समय से कमर से पैरों तक दर्द रहता है, तो हड्डी रोग या स्पाइन विशेषज्ञ से जांच कराएं. इस स्पाइनल स्टेनोसिस नई रिसर्च को उम्मीद की खबर मानें, इलाज का नया नुस्खा नहीं. डॉक्टर से पूछें कि आपके मामले में कौन से विकल्प सही हैं.
साथ ही अपने लक्षणों का छोटा रिकॉर्ड रखें. उदाहरण के लिए कितनी दूर चलने पर दर्द शुरू होता है और बैठने पर कितनी देर में आराम मिलता है. यह जानकारी डॉक्टर से बात करते समय काम आ सकती है.
स्पाइनल स्टेनोसिस नई रिसर्च से जुड़े आम सवाल
क्या अब सर्जरी की ज़रूरत खत्म हो जाएगी?
फिलहाल नहीं. दवा आधारित राह पर इंसानों में ट्रायल अभी बाकी हैं. इलाज का फैसला आपकी जांच के आधार पर डॉक्टर ही करेंगे.
क्या यह खोज दूसरी चोटों में भी काम आ सकती है?
HSS के मुताबिक टीम मार्फन सिंड्रोम जैसे रोगों में भी इस कोशिका की भूमिका देखना चाहती है. इसके अलावा रोटेटर कफ और अकिलीज़ टेंडन जैसी देर से भरने वाली चोटें भी उनकी सूची में हैं.
डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी के लिए है. इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें. किसी बीमारी, दवा, डाइट या व्यायाम में बदलाव से पहले योग्य डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
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