उत्तर प्रदेश में कथित अवैध निर्माणों पर चल रही बुलडोज़र कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए एक सप्ताह की अंतरिम सुरक्षा प्रदान की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगले सात दिनों तक दोनों पक्ष स्टेटस को बनाए रखें — यानी इस अवधि में किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ नहीं की जाएगी।
याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट जाने का निर्देश
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की दो-जजों की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ताओं को सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के बजाय पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत लेनी चाहिए।
बेंच ने कहा:
“अगर हर कोई सीधे सुप्रीम कोर्ट आ जाएगा तो अनुच्छेद 226 का क्या महत्व रह जाएगा?”
याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि वे इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश के आधार पर यहां आए हैं, पर अदालत ने साफ कहा कि पहला मंच हाईकोर्ट ही होगा।
बिना नोटिस तोड़फोड़ के आरोप
याचिकाकर्ताओं के वकील ने बताया कि:
- संपत्ति मालिक की उम्र 75 वर्ष है
- नोटिस और सुनवाई की मांग की गई थी
- लेकिन बिना नोटिस संरचना में आंशिक तोड़फोड़ की गई
- बुलडोज़र अभी भी साइट पर मौजूद है और किसी भी समय पूरी संरचना गिर सकती है
इस पर कोर्ट ने कहा कि:
“हम एक हफ्ते की सुरक्षा दे देते हैं, इस दौरान आप हाईकोर्ट में तत्काल सुनवाई की मांग करें।”
सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा अस्थायी
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि:
- सुरक्षा सिर्फ सात दिनों के लिए है
- इलाहाबाद हाईकोर्ट इस आदेश से प्रभावित नहीं होगा
- याचिकाकर्ता चाहें तो अवमानना याचिका भी दायर कर सकते हैं
सुप्रीम कोर्ट का पिछला आदेश (नवंबर 2023)
अदालत ने पहले स्पष्ट किया था कि:
✔ किसी संपत्ति को गिराने से पहले नोटिस देना अनिवार्य है
✔ मालिक को कम से कम 15 दिन का समय देना होगा
❌ सीधे तोड़फोड़ को मनमानी और अवैध माना जाएगा
हालांकि इस सुरक्षा का लाभ इन मामलों में नहीं होगा:
- सार्वजनिक स्थानों पर बने अवैध निर्माण
- जहां अदालत पहले से विध्वंस का आदेश दे चुकी हो