भारत में सौर नववर्ष 14 अप्रैल को मनाया जाता है, जो सूर्य की मेष राशि में प्रवेश का प्रतीक है।
यह दिन भारतीय पंचांग के अनुसार नवसंवत्सर की शुरुआत का संकेत देता है।
इस दिन को धार्मिक और खगोलीय दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि सूर्य का उत्तरायण होता है।
सूर्य की मेष राशि में प्रवेश को ‘मेष संक्रांति’ भी कहा जाता है।
🌞 सूर्य की नई यात्रा का आरंभ
सौर नववर्ष 14 अप्रैल से सूर्य अपनी नई राशि में प्रवेश करता है और नई ऊर्जा का संचार होता है।
यह दिन तमिल नववर्ष, पोहेला बोइशाख (बंगाल), विशु (केरल), बैसाखी (पंजाब) जैसे पर्वों से भी जुड़ा है।
भारत के विभिन्न राज्यों में यह दिन अलग-अलग नामों से जाना जाता है, लेकिन मूल उद्देश्य नववर्ष का स्वागत करना है।
🌾 कृषि, परंपरा और आस्था का संगम
यह पर्व किसानों के लिए भी खास होता है क्योंकि नई फसल की कटाई और नई उम्मीदों की शुरुआत होती है।
लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।
धार्मिक रूप से इस दिन को सूर्य की उपासना और ऊर्जा के स्वागत का दिन माना जाता है।
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📅 खगोलीय महत्त्व
सौर नववर्ष का वैज्ञानिक आधार यह है कि इस दिन सूर्य भूमध्य रेखा को पार कर उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है।
यह खगोलीय परिवर्तन ऋतुओं के बदलाव को दर्शाता है और दिन-रात की लंबाई में अंतर लाता है।
🌍 वैश्विक उत्सव
केवल भारत ही नहीं, बल्कि थाईलैंड (सोंगक्रान), श्रीलंका (अलुथ अवरुद्ध), कंबोडिया (चोल चनाम थमय) जैसे देशों में भी
सौर नववर्ष 14 अप्रैल को पारंपरिक उत्सवों के रूप में मनाया जाता है।
यह सांस्कृतिक एकता और प्रकृति के साथ जुड़ाव का प्रतीक बन चुका है।
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