बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के घरों में जितिया आते ही बाजार में एक खास साग की तलाश शुरू हो जाती है. नोनी साग और मड़ुआ रोटी इस व्रत की पहचान बन चुके हैं. इस साल व्रत 3 अक्टूबर को और पारण 4 अक्टूबर की सुबह होगा. आइए समझें कि ये दोनों चीजें थाली तक कैसे पहुंचीं.
जितिया में नोनी साग और मड़ुआ रोटी क्यों खाई जाती है
इसका जवाब आस्था और खेती, दोनों में छिपा है. मान्यता है कि नोनी साग के बिना जितिया अधूरा रहता है. वहीं नवभारत लाइव की रिपोर्ट के मुताबिक पुराने समय में इन इलाकों में मड़ुआ खूब उगाया जाता था. इसलिए स्थानीय फसल और मौसमी साग धीरे-धीरे व्रत की रस्म का हिस्सा बन गए.
जितिया 2026 और इस थाली से जुड़े तथ्य
- व्रत की तारीख: शनिवार, 3 अक्टूबर 2026, द्रिक पंचांग के अनुसार.
- नहाय-खाय शुक्रवार 2 अक्टूबर को और पारण रविवार 4 अक्टूबर की सुबह.
- मड़ुआ को ही रागी या फिंगर मिलेट कहा जाता है.
- आईसीएमआर-एनआईएन के आंकड़ों के मुताबिक 100 ग्राम रागी में लगभग 344 मिलीग्राम कैल्शियम होता है.
- कई परिवार नहाय-खाय में और कई पारण में ये चीजें बनाते हैं.
नहाय-खाय से पारण तक कहां आता है यह खाना
जितिया तीन दिन का पर्व माना जाता है. पहले दिन नहाय-खाय होता है. दूसरे दिन माताएं बिना अन्न और जल का व्रत रखती हैं. फिर तीसरे दिन सुबह पारण होता है.
दरअसल नोनी साग और मड़ुआ रोटी को लेकर परंपरा हर इलाके में एक जैसी नहीं है. प्रभात खबर की एक पुरानी रिपोर्ट में नहाय-खाय के दिन नोन्ही साग और मड़ुआ रोटी बनाने का जिक्र है. वहीं एशियानेट हिंदी और टाइम्स नाउ नवभारत ने इन्हें पारण के भोजन में गिनाया है. यानी दोनों तरीके प्रचलित हैं.
मिथिला से झारखंड तक अलग-अलग रिवाज
नवभारत लाइव की एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के मिथिला क्षेत्र में नहाय-खाय पर मड़ुआ रोटी खाने का चलन है. इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि मिथिला में कई महिलाएं रागी की रोटी घी के साथ खाती हैं.
इसके अलावा कुछ इलाकों में नहाय-खाय पर मछली खाने की भी परंपरा है. रिपोर्ट इसकी वजह बरसात में मछली का आसानी से मिलना बताती है. हालांकि कई परिवार पूरी तरह शाकाहारी नियम मानते हैं. इसलिए हर घर अपनी पीढ़ियों से चली आ रही रीत ही अपनाता है.
मड़ुआ यानी रागी का पोषण क्या कहता है
अब बात उस हिस्से की, जिसे आंकड़ों से परखा जा सकता है. वाणिज्य मंत्रालय के एपीडा मिलेट पोर्टल पर राष्ट्रीय पोषण संस्थान यानी एनआईएन के आंकड़े दिए गए हैं. इनके मुताबिक 100 ग्राम रागी में करीब 344 मिलीग्राम कैल्शियम और 7.3 ग्राम प्रोटीन होता है.
साथ ही 2021 में फ्रंटियर्स इन सस्टेनेबल फूड सिस्टम्स जर्नल में छपी एक समीक्षा भी यही 344 मिलीग्राम का आंकड़ा दोहराती है. इस समीक्षा के मुताबिक गेहूं में करीब 41, चावल में 33 और मक्का में 26 मिलीग्राम कैल्शियम होता है. यानी कैल्शियम के मामले में रागी इन अनाजों से काफी आगे है.
इसी समीक्षा में रागी को ग्लूटेन-फ्री अनाज बताया गया है. ग्लूटेन गेहूं का वह प्रोटीन है, जो आटे को लचीला बनाता है. इसलिए मड़ुआ की रोटी बेलने में टूटती है और हाथ से थपथपाकर बनानी पड़ती है.
ध्यान रहे कि ये आंकड़े कच्चे अनाज के हैं. पकाने के बाद और हर किस्म में मात्रा कुछ बदल सकती है.
नोनी साग के बारे में क्या पता है
नोनी एक पत्तेदार साग है, जो जितिया के मौसम में बाजार में दिखता है. नवभारत लाइव की 2024 की एक रिपोर्ट में इसे बहुत पवित्र मानने की मान्यता का जिक्र है. उसी रिपोर्ट में कहा गया है कि यह साग अब पहले जितना आसानी से नहीं मिलता.
हालांकि नोनी साग पर भरोसेमंद पोषण आंकड़े हमें किसी आधिकारिक तालिका में नहीं मिले. इसलिए इसके फायदों पर बड़े दावे करना ठीक नहीं होगा. फिलहाल इसे एक मौसमी हरी सब्जी की तरह ही देखना बेहतर है.
नोनी साग और मड़ुआ रोटी घर पर बनाने की विधि
नोनी साग के लिए: एक गड्डी साग, सरसों तेल, जीरा, मेथी दाना, सूखी लाल मिर्च, हल्दी और नमक.
1. साग को बहते पानी में कई बार धोएं, ताकि जड़ों की मिट्टी निकल जाए.
2. पत्ते बारीक काटें और मोटे डंठल अलग कर दें.
3. तेल में जीरा, मेथी और लाल मिर्च चटकाएं, फिर साग डालें.
4. हल्दी-नमक मिलाकर ढकें और धीमी आंच पर तब तक पकाएं, जब तक पानी सूख न जाए.
मड़ुआ रोटी के लिए: मड़ुआ का आटा, नमक, गर्म पानी और घी.
1. आटे को गर्म पानी से नरम गूंथें, क्योंकि इसमें ग्लूटेन नहीं होता.
2. गीली हथेलियों से लोई को गोल और चपटा करें.
3. तवे पर दोनों ओर सेंकें, फिर आंच पर फुलाकर घी लगाएं.
इस परंपरा को आज कैसे देखें
कुल मिलाकर नोनी साग और मड़ुआ रोटी सिर्फ व्रत का खाना नहीं हैं. दरअसल ये उस दौर की याद हैं, जब त्योहार का भोजन आसपास की फसल से तय होता था. आज जब मोटे अनाज फिर चर्चा में हैं, तो यह थाली एक पुरानी सीख भी दोहराती है.
इसके बावजूद पारण का सटीक समय अपने शहर के पंचांग से ही देखें. दरअसल अलग-अलग पंचांगों में तिथि के समय में अंतर मिलता है.
डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी के लिए है. इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें. किसी बीमारी, दवा, डाइट या व्यायाम में बदलाव से पहले योग्य डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. व्रत से जुड़ी बातें पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं.
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