‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ से भारत-यूरोप रणनीतिक रिश्तों को नई मजबूती

भारत और यूरोपीय संघ के बीच लंबे समय से चल रही मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बातचीत अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। दोनों पक्ष आज एक ऐसे ऐतिहासिक समझौते की घोषणा कर सकते हैं, जिसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है। यह समझौता भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक और रणनीतिक रिश्तों को नई ऊंचाई देने वाला साबित हो सकता है।

भारत और यूरोपीय संघ मिलकर वैश्विक व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके साथ ही, दुनिया की करीब 25 प्रतिशत आबादी इन दोनों क्षेत्रों में रहती है। ऐसे में यह समझौता न केवल द्विपक्षीय बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रक्षा सहयोग को लेकर अहम चर्चा

व्यापार के साथ-साथ रक्षा सहयोग भी इस साझेदारी का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और यूरोपीय संघ की विदेश एवं सुरक्षा मामलों की प्रमुख काजा कालास के बीच हुई बैठक में रक्षा क्षेत्र में सप्लाई चेन के एकीकरण पर विस्तार से चर्चा हुई।

राजनाथ सिंह ने बताया कि बैठक में भरोसेमंद रक्षा इकोसिस्टम के निर्माण, भविष्य के लिए तैयार क्षमताओं के विकास और द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने पर विचार किया गया। दोनों पक्षों ने रक्षा आपूर्ति श्रृंखला को जोड़ने के नए अवसरों की पहचान पर सहमति जताई।

शिखर सम्मेलन से पहले बढ़ी रणनीतिक गतिविधियां

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा से हैदराबाद हाउस में मुलाकात की। यह बैठक भारत–ईयू शिखर सम्मेलन से पहले हुई, जिसे आने वाले समय में रिश्तों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।

शिखर सम्मेलन में दोनों पक्ष एक संयुक्त व्यापक रणनीतिक एजेंडा अपनाने पर सहमत हो सकते हैं, जिसमें व्यापार, निवेश, सुरक्षा, तकनीक और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और गहराई देने की योजना है।

2007 से 2026 तक का लंबा सफर

भारत और यूरोपीय संघ के बीच FTA की बातचीत पहली बार 2007 में शुरू हुई थी। लंबे अंतराल के बाद 2022 में इसे फिर से शुरू किया गया और अब 2026 में इसे अंतिम रूप दे दिया गया है।

यह समझौता व्यापार बाधाओं को कम करने, निवेश को बढ़ावा देने और दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच नई संभावनाओं के द्वार खोलने में अहम भूमिका निभाएगा।

कुल मिलाकर, यह ऐतिहासिक डील भारत और यूरोपीय संघ के रिश्तों को एक नई रणनीतिक और आर्थिक ऊंचाई पर ले जाने वाली साबित हो सकती है।

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