लिव-इन कानूनी संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन कानूनी संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि हर लिव-इन रिलेशनशिप को स्वतः आपराधिक कानून का संरक्षण नहीं मिलेगा। हालांकि, यदि रिश्ता विवाह जैसा हो और दोनों का शादी करने का वास्तविक इरादा साबित हो, तो महिला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 85 के तहत घरेलू क्रूरता का मामला दर्ज करा सकती है।

लिव-इन कानूनी संरक्षण किन मामलों में मिलेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल साथ रहना पर्याप्त नहीं होगा। अदालत ने कहा कि कुछ तय शर्तें पूरी होने पर ही महिला को आपराधिक कानून का संरक्षण मिलेगा।

कोर्ट के अनुसार, चार प्रमुख शर्तें आवश्यक हैं।

  • दोनों व्यक्ति बालिग हों।
  • दोनों अपनी इच्छा से साथ रह रहे हों।
  • रिश्ता व्यवहार में विवाह जैसा हो।
  • दोनों का शादी करने का वास्तविक इरादा हो।

इन शर्तों के पूरा होने पर अदालत मामले की परिस्थितियों के अनुसार संरक्षण देने पर विचार करेगी।

मुख्य बातें

  • सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन संबंधों पर कानूनी स्पष्टता दी।
  • हर लिव-इन रिश्ता कानून के दायरे में नहीं आएगा।
  • विवाह जैसे रिश्ते को प्राथमिक आधार माना जाएगा।
  • शादी करने का इरादा महत्वपूर्ण शर्त होगी।
  • फैसला केवल बीएनएस की धारा 85 से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला क्यों दिया?

लिव-इन कानूनी संरक्षण पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि घरेलू क्रूरता केवल विवाह तक सीमित नहीं होती। यदि कोई महिला विवाह जैसे रिश्ते में उत्पीड़न का सामना करती है, तो केवल औपचारिक विवाह न होने के कारण उसे न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि समान परिस्थितियों में महिलाओं के साथ अलग व्यवहार करना संविधान के समानता के अधिकार के विपरीत हो सकता है।

कैसे तय होगा कि रिश्ता विवाह जैसा था?

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कुछ संकेतक बताए हैं। अदालत इन तथ्यों के आधार पर हर मामले का अलग-अलग मूल्यांकन करेगी।

  • दोनों कितने समय तक साथ रहे।
  • क्या वे एक ही घर में पति-पत्नी की तरह रहते थे।
  • घरेलू जिम्मेदारियां साझा करते थे या नहीं।
  • आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर थे।
  • समाज में उनकी पहचान पति-पत्नी जैसी थी।
  • रिश्ता स्थायी और गंभीर प्रकृति का था।

इन परिस्थितियों के आधार पर अदालत यह तय करेगी कि संबंध वास्तव में विवाह जैसा था या नहीं।

मुख्य अपडेट

  • घरेलू हिंसा कानून और बीएनएस की धारा 85 अलग हैं।
  • घरेलू हिंसा कानून सिविल राहत देता है।
  • बीएनएस की धारा 85 आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान करती है।
  • शिकायत पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी।
  • पुलिस पहले प्रारंभिक जांच करेगी।

महिलाओं के अधिकारों पर क्या पड़ेगा असर?

लिव-इन कानूनी संरक्षण के इस फैसले से उन महिलाओं को राहत मिल सकती है जो लंबे समय से विवाह जैसे संबंध में रह रही थीं और घरेलू उत्पीड़न का सामना कर रही हैं।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का प्रभाव विवाह, संपत्ति, उत्तराधिकार या अन्य पारिवारिक कानूनों पर स्वतः लागू नहीं होगा। यह निर्णय केवल घरेलू क्रूरता से जुड़े आपराधिक मामलों तक सीमित रहेगा।

यह भी पढ़ें: मोहन भागवत के जेन-जी संवाद पर अभिजीत दीपके की प्रतिक्रिया 
मणिपुर टैंकर वसूली मामले में सीआरपीएफ का बड़ा खुलासा, कार्रवाई शुरू 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *