सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई ने एक खास इंटरव्यू में न्यायपालिका से जुड़े सबसे विवादित और संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर जवाब दिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलनी चाहिए, क्योंकि भारत का संविधान विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — तीनों संस्थाओं के शक्तियों के संतुलन और स्वतंत्र कार्यक्षेत्र पर आधारित है।
इंटरव्यू के दौरान उनसे राज्यों की सरकारों के निर्देश पर चलने वाली बुलडोजर कार्रवाई और न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव जैसे तीखे सवाल भी पूछे गए, जिन पर उन्होंने बिना झिझक अपनी राय रखी।
⚖️ “आर्थिक रूप से कमजोर नागरिक को अदालत तक पहुंचने का अधिकार मिलना जरूरी”
पूर्व चीफ जस्टिस ने कहा कि देश का वह नागरिक जो सामाजिक और आर्थिक कारणों से अपनी बात सरकारी तंत्र तक नहीं पहुंचा पाता, उसे सीधे अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की अनुमति मिलना गलत नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की यही उपलब्धता और संवेदनशीलता समाज के अंतिम व्यक्ति तक आर्थिक और सामाजिक न्याय पहुँचाने के वादे को पूरा करती है।
🏛️ न्यायपालिका का उद्देश्य — न्याय, भय नहीं
बीआर गवई के अनुसार,
🔹 न्यायिक सक्रियता का मतलब न्याय को मजबूत करना है,
🔹 लेकिन सक्रियता का डर समाज या सरकार पर दहशत के रूप में नहीं छाना चाहिए।
उनके बयान ने एक बार फिर देश में चल रही बहस को गति दे दी है —
क्या न्यायिक सक्रियता न्याय की रक्षा है या अतिसक्रियता शासन के निर्णयों में हस्तक्षेप?