कृषि क्षेत्र में तकनीकी नवाचारों के साथ नैनो उर्वरक किसानों के लिए एक प्रभावी विकल्प बनकर उभर रहे हैं। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे उन्नत उर्वरक फसलों को आवश्यक पोषक तत्व अधिक दक्षता के साथ उपलब्ध कराते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन उर्वरकों के उपयोग से कम लागत पर बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही यह खेती को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
रासायनिक उर्वरकों पर कम होगी निर्भरता
कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों के अनुसार पारंपरिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। ऐसे में नैनो उर्वरक पोषक तत्वों की बेहतर उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं और मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों की रक्षा करने में मददगार साबित होते हैं। इनका उपयोग पोषक तत्वों की बर्बादी को कम करता है और पौधों को संतुलित पोषण प्रदान करता है।
नैनो यूरिया के सही उपयोग से मिलेगा बेहतर परिणाम
विशेषज्ञों ने बताया कि नैनो उर्वरक के रूप में नैनो यूरिया का उपयोग पर्णीय छिड़काव के जरिए किया जाता है। इसे 4 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से मिलाकर छिड़का जाता है। 500 मिलीलीटर की एक बोतल एक एकड़ क्षेत्र के लिए पर्याप्त मानी जाती है। पहला छिड़काव 30 से 35 दिन और दूसरा 55 से 60 दिन की अवस्था में करने से फसलों की वृद्धि और उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है।
नैनो डीएपी भी किसानों के लिए लाभकारी
फास्फोरस की पूर्ति के लिए नैनो–उर्वरक के रूप में नैनो-डीएपी का उपयोग किया जा रहा है। इसे बीजोपचार और पर्णीय छिड़काव दोनों रूपों में प्रयोग किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पौधों को तेजी से पोषण उपलब्ध कराता है, जिससे जड़ विकास और फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है। इसके उपयोग से उर्वरकों की खपत भी कम होती है।
मिट्टी और पर्यावरण संरक्षण में निभा रहे भूमिका
नैनो उर्वरक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पोषक तत्व सीधे पौधों तक पहुंचते हैं, जिससे मिट्टी पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता। इससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है और पर्यावरण प्रदूषण भी कम होता है। कृषि विभाग किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन देकर इनके वैज्ञानिक उपयोग के प्रति जागरूक कर रहा है।
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