झारखंड आंदोलन के जननायक शिबू सोरेन का निधन, संघर्ष और राजनीति से भरी रही जिंदगी
झारखंड के पितामह और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन ने 4 जुलाई 2025 को दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में अंतिम सांस ली। 81 वर्षीय दिशोम गुरुजी लंबे समय से किडनी और श्वसन संक्रमण से पीड़ित थे और पिछले एक महीने से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे।
उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। पिता की हत्या के बाद उन्होंने राजनीति का रुख किया, और जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना – आदिवासी अधिकारों की रक्षा और झारखंड राज्य का निर्माण।
13 वर्ष की उम्र में पिता की हत्या, वहीं से शुरू हुआ संघर्ष
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को नेमरा (रामगढ़) में हुआ था। जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, तब महाजनों ने उनके पिता शोभराम सोरेन की हत्या कर दी। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और सूदखोरों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। 1970 में उन्होंने ‘धान कटनी आंदोलन’ से हलचल मचा दी।
1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन
1971 में बांग्लादेश की आजादी से प्रेरणा लेकर शिबू सोरेन ने कॉमरेड एके राय और विनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। इसका लक्ष्य था बिहार से अलग एक अलग झारखंड राज्य की मांग को मजबूत करना।
साल 2000 में मिला आंदोलन को परिणाम, बना झारखंड राज्य
लगातार संघर्ष और राजनीतिक दबाव के बाद, वर्ष 2000 में झारखंड को बिहार से अलग कर एक नया राज्य घोषित किया गया। शिबू सोरेन का यह सपना वर्षों की मेहनत और बलिदान का परिणाम था।
तीन बार बने मुख्यमंत्री, लेकिन एक बार भी नहीं कर सके कार्यकाल पूरा
- पहली बार 2 मार्च 2005 को मुख्यमंत्री बने लेकिन बहुमत साबित नहीं कर सके, 10 दिन में इस्तीफा देना पड़ा।
- दूसरी बार 27 अगस्त 2008 को सीएम बने लेकिन विधायक नहीं थे, इसलिए 6 महीने में उपचुनाव जीतना जरूरी था।
- जनवरी 2009 में तमाड़ उपचुनाव से चुनाव लड़ा, लेकिन राजा पीटर से 9 हजार वोट से हार गए। तीसरी बार भी कार्यकाल अधूरा रहा।
केंद्रीय मंत्री के तौर पर भी विवादों से घिरे
यूपीए-1 सरकार में कोयला मंत्री बने, लेकिन विवादों और जांच के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने राज्य की राजनीति में दोबारा सक्रियता दिखाई, लेकिन कभी पूर्ण स्थायित्व नहीं मिला।