पश्चिम एशिया इस समय गंभीर तनाव और हिंसक संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान पर किए गए व्यापक सैन्य हमलों के बाद क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बन गई है। एक सप्ताह के भीतर ही यह टकराव कई देशों तक फैल गया है, जिससे वैश्विक राजनीति, ऊर्जा आपूर्ति और सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा असर पड़ रहा है।
इस संघर्ष में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर ने हालात को और अधिक विस्फोटक बना दिया है। इसके अलावा ईरान में हजारों नागरिकों के हताहत होने की खबरें सामने आ रही हैं। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट मंडराने लगा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है।
युद्ध की शुरुआत: 28 फरवरी
संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त सैन्य अभियान से हुई। इस अभियान में 100 से अधिक लड़ाकू विमानों और शक्तिशाली मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। सरकारी इमारतों, सैन्य ठिकानों और रणनीतिक स्थलों को निशाना बनाया गया। इसी दौरान एक हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत की खबर सामने आई।
1 मार्च: संघर्ष का विस्तार
दूसरे दिन दोनों पक्षों के बीच हमले और तेज हो गए। अमेरिका ने दावा किया कि उसने ईरान के नौ नौसैनिक जहाजों को नष्ट कर दिया और नौसेना मुख्यालय तथा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया। जवाब में ईरान ने कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे पर ड्रोन हमला किया, जिसमें कई सैनिकों की मौत हो गई। इस दौरान इस्राइल के बेत शेमेश शहर पर भी मिसाइल हमला हुआ।
2 मार्च: लेबनान तक पहुंची जंग
तीसरे दिन संघर्ष का दायरा और बढ़ गया। लेबनान से हिजबुल्ला ने इस्राइल पर मिसाइलें दागीं, जिसके बाद इस्राइल ने बेरूत पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। दूसरी ओर ईरान ने सऊदी अरब की रास तनुरा रिफाइनरी को निशाना बनाकर ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बनाने की कोशिश की।
3 मार्च: रणनीतिक हथियारों की तैनाती
चौथे दिन अमेरिका ने बंकर नष्ट करने में सक्षम बी-2 बॉम्बर तैनात किए। इस्राइल ने ईरान और हिजबुल्ला के ठिकानों पर लगातार हमले जारी रखे। इसी बीच ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर वैश्विक तेल व्यापार को बड़ा झटका दिया। ईरानी ड्रोन हमलों के कारण सऊदी अरब और कुवैत में अमेरिकी दूतावासों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
4 मार्च: समुद्री मोर्चे पर बड़ा हमला
पांचवें दिन हिंद महासागर में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया। अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरान के युद्धपोत आईआरआईएस देना को टॉरपीडो से निशाना बनाकर डुबो दिया। यह जहाज भारत में नौसैनिक अभ्यास से लौट रहा था। इस हमले में कई ईरानी नाविक मारे गए, जबकि कुछ को बचाकर श्रीलंका में इलाज दिया गया। इस रेस्क्यू ऑपरेशन में भारतीय नौसेना ने भी मदद की।
बढ़ता मानवीय संकट और वैश्विक असर
लगातार हमलों के बीच नागरिकों की मौत और बुनियादी ढांचे के नुकसान की खबरें बढ़ती जा रही हैं। स्कूलों, रिहायशी इलाकों और ऊर्जा ढांचों पर हमलों से मानवीय संकट गहराता जा रहा है। वहीं तेल की कीमतों में उछाल और व्यापार मार्गों में बाधा से वैश्विक अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है।
क्या कोई जीत के करीब है?
अब तक के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि दोनों पक्ष भारी सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन निर्णायक बढ़त किसी के हाथ नहीं लगी है। अमेरिका और इस्राइल तकनीकी और सैन्य क्षमता में मजबूत हैं, जबकि ईरान क्षेत्रीय सहयोगियों और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर नियंत्रण के जरिए जवाबी दबाव बना रहा है।
कितना लंबा चल सकता है संघर्ष?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक पहल नहीं हुई तो यह संघर्ष लंबे समय तक खिंच सकता है। इसमें लेबनान, खाड़ी देशों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के शामिल होने की आशंका भी बनी हुई है, जिससे हालात और जटिल हो सकते हैं।