सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार का पक्ष
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने साफ कहा कि विधानसभा से पारित बिलों को मंजूरी देने का अधिकार सिर्फ राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास है। इस प्रक्रिया में अदालत दखल नहीं दे सकती। वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने राज्य सरकार की ओर से पांच जजों की संविधान पीठ के सामने यह दलील रखी।
अनुच्छेद 361 और 200 का हवाला
साल्वे ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 361 और 200 स्पष्ट करते हैं कि राज्यपाल और राष्ट्रपति अपने अधिकारों के इस्तेमाल के लिए अदालत के जवाबदेह नहीं हैं। अनुच्छेद 200 के तहत बिलों पर विचार की कोई निश्चित समय सीमा भी तय नहीं है। कभी 15 दिन में निर्णय होता है और कभी छह महीने भी लग सकते हैं।
अदालत की सीमाएं
साल्वे ने तर्क दिया कि अदालत राज्यपाल या राष्ट्रपति को बिल पर हस्ताक्षर करने का आदेश नहीं दे सकती। अदालत केवल यह पूछ सकती है कि कोई फैसला लिया गया है या नहीं, लेकिन यह नहीं पूछ सकती कि क्यों लिया गया है। उन्होंने कहा कि किसी भी कानून को मंजूरी देना अदालत का काम नहीं, बल्कि संवैधानिक पदाधिकारियों का अधिकार है।
राज्यपाल की शक्ति पर बहस
महाराष्ट्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि राज्यपाल के पास बिल पर हस्ताक्षर रोकने की शक्ति है, लेकिन इसे वीटो कहना उचित नहीं होगा। साल्वे ने कहा कि बिल को वापस भेजना सलाह-मशविरा की प्रक्रिया है, स्थायी रोक लगाने का तरीका नहीं। यहां तक कि मनी बिल पर भी राज्यपाल हस्ताक्षर रोक सकते हैं।
संवैधानिक संतुलन की आवश्यकता
बहस के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि राज्यपाल की शक्तियों को संविधान ने मान्यता दी है और यह लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है। साल्वे ने कहा कि अगर अदालत इस शक्ति को मान्यता देती है, तो उसके पीछे के कारणों पर सवाल नहीं उठा सकती।