हिमाचल की कुल्लू घाटी का दशहरा रावण पर नहीं, देवताओं के मिलन पर टिका है. कुल्लू दशहरा का इतिहास 17वीं सदी के राजा जगत सिंह और भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति से जुड़ा है. इस साल यह अंतरराष्ट्रीय उत्सव 21 से 27 अक्टूबर तक ढालपुर मैदान में होगा. ऐसे में जानिए, इस परंपरा की जड़ें कहां हैं और आज यह कैसे बदल रही है.
कुल्लू दशहरा का इतिहास किस घटना से शुरू होता है
कुल्लू दशहरा का इतिहास राजा जगत सिंह से जुड़ा माना जाता है, जिन्होंने 1637 से 1662 तक राज किया. मान्यता के अनुसार उन्होंने प्रायश्चित के तौर पर अयोध्या से भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति मंगवाई. फिर उसे अपनी गद्दी पर स्थापित किया. तभी से रघुनाथ जी को घाटी का शासक देवता माना जाता है.
परंपरा और इस साल के आयोजन की झलक
- शासक देवता: भगवान रघुनाथ जी, जिनकी पूजा से उत्सव की शुरुआत होती है.
- समय: विजयादशमी से शुरू होकर सात दिन तक, इस साल 21 से 27 अक्टूबर.
- मैदान: ढालपुर, जहां गांव-गांव से देवता पालकियों में पहुंचते हैं.
- पहचान: रथ यात्रा, नाटी लोकनृत्य और देव संस्कृति.
- दर्जा: केंद्र सरकार की ओर से अंतरराष्ट्रीय उत्सव.
रघुनाथ जी की मूर्ति कुल्लू कैसे पहुंची
विकिपीडिया पर दर्ज कथा के मुताबिक राजा जगत सिंह को एक गंभीर रोग हो गया था. तब कृष्णदास नाम के एक संत ने उन्हें सलाह दी. उनके अनुसार अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से रघुनाथ जी की मूर्ति लाने पर राजा को राहत मिलती. इसके बाद मूर्ति कुल्लू लाई गई और राजा ने राजपाट उन्हें सौंप दिया.
हालांकि यह एक लोककथा है और इसके ब्योरे अलग-अलग जगह थोड़े बदल जाते हैं. फिर भी इसका मूल संदेश एक ही है. यानी कुल्लू में राजा खुद को देवता का सेवक मानने लगा. यही सोच आज भी उत्सव के हर रिवाज़ में दिखती है.
रावण दहन नहीं, देवताओं का मिलन
दरअसल देश के ज़्यादातर हिस्सों में दशहरे का केंद्र रावण दहन होता है. वहीं कुल्लू में असली आकर्षण देवताओं का जमावड़ा है. आसपास के गांवों के देवी-देवता सजी हुई पालकियों में ढालपुर पहुंचते हैं. ये सब रघुनाथ जी के दरबार में हाज़िरी लगाने आते हैं.
इनक्रेडिबल इंडिया के मुताबिक उत्सव से पहले नवरात्रि के पहले दिन सुल्तानपुर में रघुनाथ जी की विशेष पूजा होती है. इसके बाद विजयादशमी को रथ यात्रा निकलती है. साथ ही पूरे हफ्ते ढोल-नगाड़ों और नाटी नृत्य से माहौल गूंजता रहता है.
देव संस्कृति को समझना क्यों ज़रूरी है
दरअसल कुल्लू घाटी में हर गांव का अपना देवता होता है. लोग उन्हें परिवार के बुज़ुर्ग की तरह मानते हैं. इसलिए यहां दशहरा एक धार्मिक आयोजन होने के साथ सामाजिक मेल-मिलाप भी है. अलग-अलग घाटियों के लोग साल में एक बार इसी बहाने मिलते हैं.
इसके अलावा मेला व्यापार का भी बड़ा मौका रहा है. ऊनी कपड़े, शॉल और हस्तशिल्प यहां खूब बिकते हैं. यही वजह है कि इतिहासकार इसे घाटी की अर्थव्यवस्था से भी जोड़कर देखते हैं.
कुल्लू दशहरा का इतिहास और बदलता स्वरूप
कुल्लू दशहरा का इतिहास बताता है कि समय के साथ यह स्थानीय उत्सव राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय पहचान तक पहुंचा. विकिपीडिया के मुताबिक हर साल चार से पांच लाख लोग इसे देखने आते हैं. 5 अक्टूबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसमें शामिल हुए थे. उन्हें इस उत्सव में आने वाला पहला मौजूदा प्रधानमंत्री बताया जाता है.
अब परंपरा के साथ आधुनिक रंग भी जुड़ रहे हैं. हिल पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार इस बार करीब 500 ड्रोन का शो और लेज़र शो होगा. साथ ही भारतीय और विदेशी दलों की ‘ग्लोबल डांस’ प्रस्तुति भी तय है. द नॉर्थ न्यूज़ ने भी ड्रोन और लेज़र शो की योजना की पुष्टि की है.
पुरानी पहचान बचाने की कोशिश
हिल पोस्ट के मुताबिक आयोजकों ने कहा है कि मकसद कुल्लू की देव संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाना है. इसके साथ 17वीं सदी की विरासत को बचाए रखने की बात भी कही गई है. इसी कड़ी में 300 से ज़्यादा स्थानीय देवताओं के रथ यात्रा में आने की बात बताई गई है.
हालांकि बड़े आयोजन के साथ भीड़, ट्रैफिक और सफाई की चुनौती भी बढ़ती है. इसलिए समिति ने 30 इलेक्ट्रिक बसें चलाने और साफ-सफाई पर ज़ोर देने की योजना बताई है. उधर द नॉर्थ न्यूज़ के अनुसार प्रशासन को समय पर तैयारियां पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं.
छत्तीसगढ़ के पाठकों के लिए एक तुलना
छत्तीसगढ़ में बस्तर दशहरा भी देवी-देवताओं की भागीदारी के लिए जाना जाता है. वहां भी रावण दहन से ज़्यादा महत्व देवी आराधना और रथ परिक्रमा का है. इस नज़र से कुल्लू और बस्तर, दोनों दशहरे लोक आस्था की अलग धारा दिखाते हैं. अगर आपने बस्तर दशहरा देखा है, तो कुल्लू का अनुभव आपको जाना-पहचाना और नया, दोनों लगेगा.
कुल्लू के दशहरे से जुड़े आम सवाल
क्या कुल्लू दशहरा बाकी दशहरे के साथ ही खत्म हो जाता है?
नहीं. इसके उलट यहां उत्सव विजयादशमी के दिन शुरू होता है और सात दिन चलता है. इस साल यह 27 अक्टूबर तक रहेगा.
कुल्लू का दशहरा कहां मनाया जाता है?
आमतौर पर यह कुल्लू शहर के ढालपुर मैदान में होता है. भारत सरकार के उत्सव पोर्टल के अनुसार सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा भुंतर लगभग 10 किमी दूर है.
नोट: लोककथा से जुड़े ब्योरे परंपरागत मान्यताओं पर आधारित हैं. इस साल के कार्यक्रम आयोजकों की घोषणा के आधार पर हैं (जांच की तारीख: 1 अक्टूबर 2026) और इनमें बदलाव हो सकता है.
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