उत्तर भारत में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने पशु और मानव स्वास्थ्य को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। शोधकर्ताओं ने भेड़ों और बकरियों में इचिनोकोकस ग्रैनुलोसस नामक परजीवी के कई खतरनाक जीनोटाइप की पहचान की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परजीवी इंसानों में हाइडेटिड रोग जैसी गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है।
वैज्ञानिक अध्ययन में क्या सामने आया?
हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ के विभिन्न बूचड़खानों में 1,049 भेड़ों और बकरियों की जांच की गई। डीएनए विश्लेषण के दौरान वैज्ञानिकों ने जी1, जी3 और जी6 जीनोटाइप की पहचान की।
पहली बार मिला जी6 जीनोटाइप
शोध की सबसे महत्वपूर्ण खोज यह रही कि जी6 जीनोटाइप पहली बार उत्तर भारत की भेड़ों और बकरियों में स्पष्ट रूप से पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि यह परजीवी तेजी से फैल सकता है और हाइडेटिड रोग के मामलों में वृद्धि का कारण बन सकता है।
इंसानों तक कैसे पहुंचता है यह परजीवी?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह परजीवी कुत्तों और अन्य कैनिड प्रजातियों के माध्यम से मनुष्यों तक पहुंच सकता है। दूषित भोजन, पानी या संक्रमित जानवरों के संपर्क से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती
पहले के अध्ययनों में भी उत्तर भारत के कई लोगों में इस परजीवी के विभिन्न जीनोटाइप पाए जा चुके हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा मान रहे हैं।
हाइडेटिड रोग शरीर को कैसे प्रभावित करता है?
जब परजीवी के अंडे मानव शरीर में प्रवेश करते हैं, तो उनके लार्वा विभिन्न अंगों में जाकर सिस्ट बनाना शुरू कर देते हैं। यह स्थिति लंबे समय तक बिना लक्षणों के भी बनी रह सकती है।
लीवर और फेफड़ों पर सबसे ज्यादा असर
विशेषज्ञों के मुताबिक लगभग 70 प्रतिशत मामलों में हाइडेटिड रोग सबसे पहले लीवर को प्रभावित करता है। इसके अलावा फेफड़े, गुर्दे, हड्डियां और मस्तिष्क भी प्रभावित हो सकते हैं।
सिस्ट फटने पर बढ़ सकता है खतरा
यदि शरीर में बने सिस्ट किसी कारण से फट जाएं, तो मरीज को गंभीर एलर्जी, संक्रमण और जानलेवा जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।
समय पर पहचान है जरूरी
डॉक्टरों का कहना है कि हाइडेटिड रोग की समय पर पहचान और उपचार से गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है। इसलिए संक्रमण के संभावित स्रोतों से बचाव बेहद जरूरी है।
रोकथाम के लिए क्या करें?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ साफ-सफाई बनाए रखने, दूषित भोजन और पानी से बचने तथा पालतू जानवरों की नियमित जांच कराने की सलाह देते हैं।
निगरानी और जागरूकता की जरूरत
वैज्ञानिकों का मानना है कि पशुओं और इंसानों दोनों में संक्रमण की निगरानी बढ़ाने से हाइडेटिड रोग के प्रसार को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए स्वास्थ्य और पशुपालन विभागों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
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