सोशल मीडिया दबाव: सुरेश त्रिवेणी ने बताई फिल्ममेकर्स की सबसे बड़ी चुनौती

सोशल मीडिया दबाव

फिल्म निर्देशक सुरेश त्रिवेणी का मानना है कि आज के दौर में फिल्म निर्माण से ज्यादा चुनौतीपूर्ण काम दर्शकों की त्वरित प्रतिक्रियाओं को संभालना हो गया है। हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने सोशल मीडिया दबाव और ट्रोलिंग संस्कृति पर विस्तार से अपनी राय रखी।

फिल्म रिलीज से पहले ही बन जाती है राय

सुरेश त्रिवेणी के अनुसार, पहले किसी फिल्म को लेकर चर्चा उसके रिलीज होने के बाद शुरू होती थी, लेकिन अब ट्रेलर आने के साथ ही लोगों की राय बन जाती है।

सोशल मीडिया ने बदल दिया दर्शकों का व्यवहार

उन्होंने कहा कि आज कई लोग पूरी फिल्म देखे बिना ही उसके बारे में निष्कर्ष निकाल लेते हैं। यही वजह है कि सोशल मीडिया दबाव अब फिल्ममेकर्स के लिए एक नई चुनौती बन चुका है।

चिट्ठियों से इंस्टाग्राम तक का सफर

सुरेश त्रिवेणी ने बताया कि पहले दर्शकों की प्रतिक्रिया चिट्ठियों के माध्यम से कलाकारों और निर्देशकों तक पहुंचती थी। उस प्रक्रिया में समय लगता था।

अब सेकंडों में मिल जाता है फीडबैक

आज इंस्टाग्राम, एक्स और अन्य प्लेटफॉर्म्स के जरिए प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है। उनका मानना है कि सोशल मीडिया दबाव के बावजूद यह बदलाव कई मायनों में सकारात्मक भी है क्योंकि इससे दर्शकों की सोच को जल्दी समझा जा सकता है।

ट्रोलिंग को लेकर क्या बोले निर्देशक?

निर्देशक ने माना कि सोशल मीडिया पर रचनात्मक सुझाव और बेवजह आलोचना दोनों मौजूद हैं।

हर प्रतिक्रिया को गंभीरता से लेना जरूरी नहीं

उनके अनुसार, ट्रोलिंग को सुनना चाहिए लेकिन उसे अपने काम पर हावी नहीं होने देना चाहिए। यदि कोई सुझाव फिल्म को बेहतर बनाने में मदद करता है तो उसे जरूर स्वीकार करना चाहिए। यही सोच सोशल मीडिया दबाव को सकारात्मक दिशा में बदल सकती है।

महिला किरदारों को लेकर स्पष्ट है सोच

सुरेश त्रिवेणी की फिल्मों में अक्सर मजबूत महिला किरदार देखने को मिलते हैं। उन्होंने कहा कि यह कोई संयोग नहीं बल्कि उनकी व्यक्तिगत पसंद और रचनात्मक दृष्टिकोण का हिस्सा है।

महिला प्रधान कहानियों पर है भरोसा

उन्होंने बताया कि उन्हें ऐसी कहानियां पसंद हैं जिनमें महिला पात्र कहानी की धुरी बनते हैं और दर्शकों के साथ गहरा जुड़ाव स्थापित करते हैं।

‘मां-बहन’ के जरिए समाज पर सवाल

अपनी नई फिल्म ‘मां-बहन’ के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि समाज मां और बहन जैसे रिश्तों को सम्मान तो देता है, लेकिन उन्हें एक इंसान के रूप में समझने में अब भी कमी दिखाई देती है।

रिश्तों की जटिलता को दिखाती है कहानी

फिल्म में मां और बेटियों के रिश्तों को वास्तविक और भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, जिससे दर्शक खुद को कहानी से जोड़ सकें।

सिनेमा का मकसद सिर्फ संदेश देना नहीं

सुरेश त्रिवेणी का मानना है कि फिल्मों का पहला उद्देश्य मनोरंजन होना चाहिए।

सोचने पर मजबूर कर दे तो काफी है

उन्होंने कहा कि यदि कोई फिल्म दर्शकों को कुछ सेकंड के लिए भी सोचने पर मजबूर कर दे तो वह अपने उद्देश्य में सफल मानी जा सकती है। उनके मुताबिक सोशल मीडिया दबाव के दौर में भी अच्छी कहानियां हमेशा अपनी जगह बना लेती हैं।

निष्कर्ष

सुरेश त्रिवेणी का मानना है कि सोशल मीडिया ने फिल्म इंडस्ट्री के काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। हालांकि सोशल मीडिया दबाव और ट्रोलिंग नई चुनौतियां लेकर आए हैं, लेकिन सही दृष्टिकोण अपनाकर इन्हें अवसर में भी बदला जा सकता है। निर्देशक का मानना है कि अंततः दर्शक अच्छी कहानी और ईमानदार सिनेमा को जरूर स्वीकार करते हैं।


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