चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का 20 अगस्त को अचानक तिब्बत पहुंचना भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गया। कहा गया कि यह यात्रा तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ पर आयोजित समारोह के लिए थी, लेकिन इसके पीछे गहरे राजनीतिक संदेश छिपे हैं।
भारत और तिब्बत का रिश्ता प्राचीन बौद्ध धर्म से गहराई से जुड़ा है। यही कारण है कि चीन का तिब्बत पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना कभी आसान नहीं रहा। 1959 में दलाई लामा भारत आए और इसके बाद ही 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ। ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों की छाया आज भी रिश्तों पर बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन जानबूझकर जिनपिंग का तिब्बत में भव्य स्वागत कराता है। चीन का मीडिया बार-बार यह दिखाता है कि तिब्बती लोग उसकी विचारधारा के करीब हैं। लेकिन हकीकत यह है कि तिब्बत शुरू से भारत के ज्यादा करीब रहा है। यही कारण है कि हिमालयी सीमाओं पर चीन की गतिविधियां भारत के लिए लगातार खतरे का संकेत देती हैं।
भारत को और सतर्क कर रही है दलाई लामा उत्तराधिकारी की बहस। दलाई लामा ने हाल ही में कहा था कि उनका उत्तराधिकारी गादेन फोडरंग ट्रस्ट द्वारा तय होगा। मगर, चीन ने साफ किया है कि उसे किसी भी नए उत्तराधिकारी को मान्यता देनी होगी। यह रणनीति चीन की प्राचीन 36 चालों का हिस्सा मानी जाती है।
इस बार के दौरे में शी जिनपिंग ने तिब्बत में तैनात पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के अफसरों और सैनिकों से भी मुलाकात की। 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद यह दूसरी बार है जब जिनपिंग तिब्बत पहुंचे हैं। यह कदम भारत के लिए सीधा संदेश है कि चीन सीमा विवाद और सामरिक दबाव दोनों को अपनी ताकत के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता ब्रह्मपुत्र नदी के जल को लेकर भी है। तिब्बत से बहने वाली यह नदी भारत और बांग्लादेश के करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी है। यदि चीन इसमें हस्तक्षेप करता है तो भारत के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।
निष्कर्षतः, तिब्बत दौरे के पीछे चीन की असली मंशा केवल उत्सव मनाना नहीं बल्कि भारत पर दबाव बढ़ाना है। इसलिए भारत को इस हिमालयी राजनीति पर और ज्यादा सतर्क रहना होगा।