छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में ऐसा खुलासा हुआ जिसने स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
hospital on dead name विवाद का केंद्र बना “मां दंतेश्वरी ट्रॉमा एंड क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल” दो साल पहले मर चुके व्यक्ति के नाम से संचालित हो रहा है।
सरकारी अस्पताल ‘महारानी अस्पताल’ के डॉक्टर यहां नियमित सेवाएं दे रहे हैं।
लेकिन hospital on dead name से जुड़े गंभीर खुलासे के बाद भी विभाग की निष्क्रियता देखी जा रही है।
स्वास्थ्य विभाग की जांच टीम पहुंची जरूर, लेकिन सिर्फ चाय-नाश्ते और दस्तावेज़ मांगने तक सीमित रही।
अब तक न अस्पताल सील हुआ और न दस्तावेज़ जब्त किए गए, जिससे गहरी मिलीभगत की आशंका पैदा हो रही है।
जांच में मिली शिथिलता
hospital on dead name की खबर सामने आने के पांच दिन बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
स्वास्थ्य विभाग का रवैया बेहद ढीला रहा, जिससे यह अंदेशा गहराया कि कुछ ‘पर्दे के पीछे’ तय किया जा चुका है।
यदि केंद्रीय एजेंसियों जैसे CBI या ED के हाथ में मामला होता, तो कार्रवाई उसी दिन होती।
प्रशासन की निष्क्रियता बनी चिंता
जब मीडिया ने जांच का रास्ता दिखाया तब भी विभाग ने कहा, “हमें आवेदन दो तभी जांच होगी।”
क्या प्रशासन दबाव में है या किसी साजिश में शामिल? यह सवाल अब हर ओर से उठ रहे हैं।
hospital on dead name मामले में जब CHMO ने कैमरे पर कबूल कर लिया कि अस्पताल मृतक के नाम पर चल रहा है,
तो सवाल उठता है — फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
कानून की अनदेखी और जनस्वास्थ्य से खिलवाड़
यह सिर्फ एक दस्तावेज़ी गलती नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे अस्पताल को तत्काल सील कर देना चाहिए।
पर जब जांच टीम ही कमजोर हो और जिम्मेदार लोग अंदरूनी समर्थन पा रहे हों,
तब ऐसे अपराध फाइलों में दब जाते हैं और दोषी लोग बच निकलते हैं।