CEC Removal: सांसदों का नोटिस, ज्ञानेश कुमार पर ‘कदाचार’ के आरोप

देश की चुनावी व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग ने तूल पकड़ लिया है। कांग्रेस सहित विभिन्न विपक्षी दलों के 73 सांसदों ने राष्ट्रपति को एक औपचारिक नोटिस सौंपकर उनके खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया शुरू करने की पहल की है।

सूत्रों के मुताबिक, यह कदम मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे ‘सिद्ध कदाचार’ के आरोपों के आधार पर उठाया गया है। विपक्ष का दावा है कि 15 मार्च 2026 के बाद लिए गए कुछ फैसलों और कथित चूकों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस संबंध में विस्तृत दस्तावेज भी पेश किए गए हैं, जिनमें नौ अलग-अलग आरोपों का उल्लेख किया गया है।

राज्यसभा में विपक्ष के प्रमुख नेताओं में शामिल जयराम रमेश ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त का पद पर बने रहना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग पर राजनीतिक दबाव का असर दिखाई दे रहा है, जो लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।

संवैधानिक दृष्टिकोण से देखें तो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बेहद जटिल और सख्त है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत, उन्हें केवल ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अक्षम्यता’ के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक होता है। यानी कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई का समर्थन अनिवार्य है।

इसके अलावा, ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ और ‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968’ के तहत विस्तृत जांच प्रक्रिया भी लागू होती है। इसमें आरोपों की जांच, गवाहों के बयान और संबंधित पक्ष को अपना बचाव प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाता है।

विपक्षी दलों का कहना है कि हाल के वर्षों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उनकी चिंताएं बढ़ी हैं। उनका आरोप है कि कई अहम निर्णयों में पारदर्शिता की कमी रही है और निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं। ऐसे में, यह महाभियोग प्रस्ताव केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर उठाया गया कदम बताया जा रहा है।

अब देखना यह होगा कि यह मामला संसद में किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या यह प्रस्ताव आवश्यक समर्थन हासिल कर पाता है या नहीं। फिलहाल, इस घटनाक्रम ने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

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