छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में बच्चों का कुपोषण एक बार फिर चिंताजनक रूप लेता जा रहा है। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों में 83 हजार बच्चों में से 14,563 बच्चे कुपोषित हैं। इनमें से 2,264 बच्चे गंभीर स्थिति में हैं, जो एनआरसी सेंटरों में इलाज के लिए भर्ती किए गए हैं।
जहां सरकार दावा कर रही है कि कुपोषण दर में गिरावट आई है, वहीं विपक्ष इस मुद्दे को सत्तापक्ष की योजनाओं की विफलता करार दे रहा है। भाजपा का कहना है कि रेडी टू ईट भोजन और गर्म आहार की व्यवस्था से स्थिति में सुधार आया है। वहीं कांग्रेस आरोप लगा रही है कि भाजपा सरकार ने पिछली सरकार की पोषण योजनाओं को बंद कर दिया, जिससे बच्चों की स्थिति और खराब हो गई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि कुपोषण जैसी समस्या केवल आंकड़ों से हल नहीं होती, बल्कि इसके लिए जागरूकता, भोजन की गुणवत्ता, निगरानी और क्रियान्वयन की सख्ती ज़रूरी है। हालांकि प्रशासन का कहना है कि जिले में 10 से अधिक योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां करती है।
बीते दो सालों में एनआरसी सेंटरों में 8 हजार बच्चों को भर्ती किया गया, लेकिन इनमें से 40% अब भी कुपोषण की स्थिति में हैं। इससे साफ है कि सरकार के प्रयास काफी नहीं हैं, या तो योजनाएं ठीक से नहीं चल रहीं, या फिर उनका लाभ ज़रूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा।
राजनीति इस मसले पर भी भारी पड़ती नजर आ रही है। जहां भाजपा कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस भाजपा पर लापरवाही का आरोप मढ़ रही है। लेकिन इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच असली सवाल ये है – क्या कोई भी सरकार बच्चों को स्वस्थ और पोषित रखने की जिम्मेदारी से बच सकती है?
बस्तर के बच्चों को केवल सरकारी भाषण नहीं, ठोस पोषण चाहिए। इस दिशा में अब गंभीर सोच और ईमानदार कार्यवाही की ज़रूरत है।