अमेरिका की दोहरी चाल: पाकिस्तान के साथ गुप्त समझौता?
अमेरिका को अक्सर दुनिया का सबसे अविश्वसनीय साझेदार कहा जाता है। हाल ही में इसका एक और उदाहरण सामने आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान की कठपुतली सरकार को दरकिनार कर सीधे सेना प्रमुख असीम मुनीर से मुलाकात की। माना जा रहा है कि इस मुलाकात का असर भारत के खिलाफ नई रणनीतियों के रूप में देखने को मिल सकता है।
बलूच मुद्दा: भारत को घेरने की तैयारी?
ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में पाकिस्तान की मांग पर दो बलूच संगठनों को आतंकवादी घोषित कर दिया। जबकि इन संगठनों का अमेरिका से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले के जरिए अमेरिका पाकिस्तान को बलूच मुद्दे पर मजबूत करना चाहता है। यही नहीं, आशंका जताई जा रही है कि भविष्य में ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे को भारत से जोड़ने की कोशिश कर सकता है।
खालिस्तान से लेकर बलूचिस्तान तक: वही पुराना खेल
यह पहला मौका नहीं है जब अमेरिका ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की है। कनाडा में खालिस्तान विवाद के दौरान भी वॉशिंगटन की भूमिका संदिग्ध रही थी। उस समय जस्टिन ट्रूडो ने भारत पर आरोप तो लगाए, लेकिन सबूत पेश नहीं कर पाए। नतीजा यह हुआ कि ट्रूडो को राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी। अब बलूचिस्तान मामले में भी वही प्रचार रणनीति दोहराए जाने की आशंका है।
पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा और अमेरिकी समर्थन
पाकिस्तान लंबे समय से यह दावा करता आया है कि भारत बलूच विद्रोहियों को आर्थिक मदद करता है। अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा बीएलए और मजीद ब्रिगेड पर प्रतिबंध लगाने से इस झूठे नैरेटिव को और हवा मिल गई है। पाकिस्तान अब इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है, और अमेरिका उसके सुर में सुर मिला सकता है।
निखिल गुप्ता केस और भारत पर आरोप
अमेरिका ने हाल ही में भारतीय मूल के नागरिक निखिल गुप्ता को गिरफ्तार किया, जिस पर खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश का आरोप लगाया गया। इसी तरह कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर हत्याकांड में भारत पर आरोप लगाया था। हालांकि, उन्होंने खुद माना कि उनके पास सबूत नहीं हैं। ऐसे मामलों से साफ है कि वॉशिंगटन अक्सर भारत को अंतरराष्ट्रीय दबाव में लाने की कोशिश करता है।
ट्रंप की अप्रत्याशित विदेश नीति
डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति को विशेषज्ञ अनिश्चित और असंगत बताते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान चीन को अपना सबसे बड़ा दुश्मन बताने वाले ट्रंप अब उसी चीन के साथ समझौता कर चुके हैं। दूसरी ओर, भारत जो इंडो-पैसिफिक रणनीति का अहम हिस्सा था, अब अमेरिकी सेकेंडरी टैरिफ का शिकार है। यही कारण है कि आशंका जताई जा रही है कि ट्रंप किसी भी समय पाकिस्तान को खुश करने के लिए बलूच विद्रोहियों का भारत से संबंध जोड़ सकते हैं।