भारत का चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। इसके भीतर मतभेदों का इतिहास कई दशक पुराना है। 1989 में आयोग में अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए। इसके बाद अधिकारों को लेकर सवाल उठे। 1993 में टीएन शेषन के दौर में विवाद बढ़ा। 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय आयोग की भूमिका स्पष्ट की।
इसके बाद भी कई मामले सामने आए। एन गोपालस्वामी और नवीन चावला का विवाद चर्चा में रहा। 2019 में अशोक लवासा की असहमति भी सामने आई। अब 2026 में दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां चर्चा में हैं।
1989 में बहुसदस्यीय आयोग की शुरुआत कैसे हुई?
अक्टूबर 1989 में दो चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए। इनमें एसएस धनाओआ और वीएस सीगल शामिल थे। उस समय आरवीएस पेरी शास्त्री सीईसी थे।
हालांकि, यह व्यवस्था ज्यादा समय नहीं चली। 1990 में दोनों नियुक्तियां समाप्त कर दी गईं। इसके बाद आयोग फिर एक सदस्यीय हो गया।
1993 में व्यवस्था दोबारा बदली गई। टीएन शेषन उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त थे। एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति आयुक्त बने।
इसके बाद अधिकारों को लेकर विवाद शुरू हुआ। शेषन ने बहुसदस्यीय व्यवस्था को चुनौती दी। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
शेषन के दौर में विवाद इतना क्यों बढ़ा?
टीएन शेषन और दोनों आयुक्तों में मतभेद बढ़ते गए। विवाद आयोग की शक्तियों से भी जुड़ा था। शेषन बहुसदस्यीय व्यवस्था से सहमत नहीं थे।
इसी दौरान शेषन ने दोनों आयुक्तों पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने उन्हें “दो गधे” कहा था। यह बयान बाद में काफी चर्चित हुआ।
इस विवाद की जड़ केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं थी। मुख्य सवाल अधिकारों के बंटवारे का था। निर्णय लेने की प्रक्रिया भी बड़ा मुद्दा थी।
सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की भूमिका कैसे तय की?
14 जुलाई 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया। अदालत ने शेषन की चुनौती को खारिज किया। उसने बहुसदस्यीय आयोग की व्यवस्था को बरकरार रखा।
अदालत ने सीईसी और अन्य आयुक्तों की भूमिका पर भी बात की। सीईसी को “फर्स्ट अमंग इक्वल्स” माना गया। इसका मतलब सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से है।
इस फैसले ने आयोग की कार्यप्रणाली स्पष्ट की। इससे तीनों सदस्यों की भूमिका को आधार मिला।
गोपालस्वामी और नवीन चावला का विवाद क्या था?
2009 में आयोग में एक और विवाद सामने आया। उस समय एन गोपालस्वामी सीईसी थे। उन्होंने नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की।
गोपालस्वामी ने चावला पर पक्षपात के आरोप लगाए थे। सरकार ने उनकी सिफारिश स्वीकार नहीं की। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सरकार की सलाह मानी।
इसके बाद चावला ने सीईसी का पद संभाला। इस घटनाक्रम ने आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर चर्चा बढ़ाई।
2019 में अशोक लवासा की असहमति क्यों सामने आई?
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान अशोक लवासा चर्चा में आए। वह उस समय चुनाव आयुक्त थे। सुनील अरोड़ा मुख्य चुनाव आयुक्त थे।
आचार संहिता से जुड़े मामलों में लवासा ने अलग राय दी। उन्होंने अपनी असहमति को आदेशों में दर्ज करने की मांग की। आयोग ने उस समय इसे स्वीकार नहीं किया।
इसके बाद लवासा कुछ बैठकों से अलग रहे। अगस्त 2020 में उन्होंने चुनाव आयुक्त पद से इस्तीफा दिया। बाद में वह एशियाई विकास बैंक के उपाध्यक्ष बने।
यह मामला असहमति दर्ज करने की प्रक्रिया से जुड़ा था। इससे आयोग की निर्णय प्रणाली पर बहस हुई।
2026 में फिर क्यों चर्चा में हैं आयोग के मतभेद?
सितंबर 2026 में इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट में आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों का जिक्र है।
रिपोर्ट के अनुसार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्तियां दर्ज कीं। दोनों ने करीब दस महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति जताई।
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ फैसलों की जानकारी नहीं होने की बात कही गई। मतदाता पंजीकरण से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए। फॉर्म-6 में बदलाव का मामला भी सामने आया।
मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण पर भी सवाल बताए गए। इन मुद्दों का संबंध SIR प्रक्रिया से भी है।
हालांकि, चुनाव आयोग ने अलग राय को सामान्य बताया। आयोग ने कहा कि फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
आयोग में मतभेद और SIR का क्या संबंध है?
SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण अभी चर्चा में है। यह मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ी प्रक्रिया है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में बदलाव हुए। ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से ज्यादा नाम कम हुए।
दो आयुक्तों की आपत्तियां भी इसी प्रक्रिया से जुड़ी बताई गईं। फॉर्म-6 में किए गए बदलाव का मुद्दा उठा। डिजिटल डेटाबेस के नियंत्रण पर भी सवाल सामने आए।
हालांकि, आपत्ति और अंतिम फैसला अलग बातें हैं। चुनाव आयोग ने फैसलों को सर्वसम्मत बताया है। इसलिए अलग-अलग दावों को स्रोतों के साथ देखना जरूरी है।
आयोग में मतभेद के पीछे कौन से मुद्दे रहे?
- अधिकारों का बंटवारा: सीईसी और आयुक्तों की शक्तियां अहम मुद्दा रही हैं।
- निर्णय प्रक्रिया: बहुसदस्यीय आयोग में सामूहिक फैसले महत्वपूर्ण हैं।
- असहमति दर्ज करना: अलग राय दर्ज करने की प्रक्रिया भी चर्चा में रही।
- मतदाता सूची: नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया अहम है।
- डिजिटल सिस्टम: डेटा नियंत्रण अब नई बहस का हिस्सा है।
1989 से 2026 तक प्रमुख घटनाएं
- 1989: दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए।
- 1990: बहुसदस्यीय व्यवस्था समाप्त कर दी गई।
- 1993: गिल और कृष्णमूर्ति चुनाव आयुक्त बने।
- 1995: सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय व्यवस्था बरकरार रखी।
- 2009: गोपालस्वामी ने चावला को हटाने की सिफारिश की।
- 2019: लवासा की असहमति सार्वजनिक चर्चा में आई।
- 2020: लवासा ने चुनाव आयुक्त पद से इस्तीफा दिया।
- 2026: संधू और जोशी की आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई।
कुल मिलाकर, आयोग के भीतर मतभेद कोई नई घटना नहीं हैं। अलग-अलग दौर में मुद्दे बदलते रहे हैं। कभी अधिकारों का सवाल सामने आया। कभी निर्णय प्रक्रिया चर्चा में रही।
2019 में असहमति दर्ज करने का मुद्दा उठा। अब मतदाता सूची और डिजिटल सिस्टम चर्चा में हैं। 1995 का सुप्रीम कोर्ट फैसला इस इतिहास का अहम हिस्सा है।
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