मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास में विभिन्न संत-महात्माओं ने सौजन्य मुलाकात की। इस दौरान संत समाज ने विद्यालयों में भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक शिक्षा से जुड़े पारंपरिक श्लोकों एवं मंत्रों को पुनः शामिल करने के निर्णय का स्वागत किया। संतों ने कहा कि संस्कारयुक्त शिक्षा बच्चों के व्यक्तित्व विकास और नैतिक निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह निर्णय नई पीढ़ी को भारतीय परंपराओं से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बनेगा।
भारतीय संस्कृति से जुड़ेंगे विद्यार्थी
संत-महात्माओं ने कहा कि पहले विद्यालयों में विद्यार्थियों को गुरु वंदना, शांतिपाठ और अन्य सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराया जाता था। इससे उनमें अनुशासन, सम्मान और नैतिकता जैसे गुण विकसित होते थे। उन्होंने कहा कि संस्कारयुक्त शिक्षा की पुनर्स्थापना से छात्र भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। यह पहल शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर जीवन मूल्यों से जोड़ने का कार्य करेगी।
शिक्षा और संस्कार दोनों आवश्यक
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि संस्कारयुक्त शिक्षा ही एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकती है, जहां ज्ञान के साथ चरित्र और नैतिकता का भी विकास हो। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि जिम्मेदार और जागरूक नागरिक तैयार करने का आधार है। आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश समय की आवश्यकता है।
विद्यार्थियों में बढ़ेगा आत्मविश्वास और अनुशासन
मुख्यमंत्री ने कहा कि विद्यालयों में शांतिपाठ, सरस्वती वंदना, भोजन मंत्र और अन्य प्रेरणादायी प्रार्थनाओं के समावेश से विद्यार्थियों में सकारात्मक सोच विकसित होगी। संस्कारयुक्त शिक्षा बच्चों में आत्मविश्वास, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करेगी। इससे वे अपने जीवन में नैतिक मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित होंगे और समाज के प्रति संवेदनशील बनेंगे।
सांस्कृतिक विरासत को सशक्त बनाने की दिशा में कदम
संत समाज ने मुख्यमंत्री को इस पहल के लिए साधुवाद देते हुए कहा कि संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का माध्यम बनेगी। उन्होंने विश्वास जताया कि यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों को भारतीय परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे शिक्षा व्यवस्था में सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों का संतुलित समावेश सुनिश्चित होगा।
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