बांग्लादेश ने अपने दूसरे सबसे व्यस्त समुद्री बंदरगाह मोंगला पोर्ट के विकास का प्रोजेक्ट चीन को सौंप दिया है। पहले यह जिम्मेदारी भारत के पास थी, लेकिन सरकार बदलने के बाद पुराने समझौते को रद्द कर दिया गया। अब मोंगला पोर्ट चीन के हाथ में जाने से दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिति पर नई बहस शुरू हो गई है।
भारत के लिए क्यों अहम है मोंगला पोर्ट?
मोंगला पोर्ट भारत की पूर्वी सीमा और बंगाल की खाड़ी के बेहद करीब स्थित है। भारत इस बंदरगाह का उपयोग पूर्वोत्तर राज्यों के साथ व्यापार और संपर्क बढ़ाने के लिए करना चाहता था। विशेषज्ञों का मानना है कि मोंगला पोर्ट चीन को मिलने से भारत की इस योजना को बड़ा झटका लगा है।
सीमा के पास चीन की मौजूदगी क्यों चिंता बढ़ाती है?
मोंगला पोर्ट भारत की समुद्री सीमा से लगभग 130 किलोमीटर और जमीनी सीमा से करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यदि भविष्य में चीन यहां अपनी नौसैनिक या लॉजिस्टिक गतिविधियां बढ़ाता है, तो भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि मोंगला पोर्ट चीन का मुद्दा रणनीतिक हलकों में गंभीरता से देखा जा रहा है।
चिकन नेक कॉरिडोर पर भी पड़ सकता है असर
भारत लंबे समय से सिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी चिकन नेक पर अपनी निर्भरता कम करने के विकल्प तलाश रहा है। मोंगला पोर्ट इस दिशा में महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता था। लेकिन अब चीन की भागीदारी के बाद इस क्षेत्र में भारत की रणनीतिक योजनाओं पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
क्या है चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति?
रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, चीन हिंद महासागर क्षेत्र में बंदरगाहों और समुद्री परियोजनाओं के जरिए अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनटोटा और जिबूती में उसकी मौजूदगी पहले से चर्चा में रही है। अब मोंगला पोर्ट चीन के साथ जुड़ने को भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, हालांकि चीन इन परियोजनाओं को आर्थिक सहयोग का हिस्सा बताता है।
भारत के लिए आगे क्या चुनौती?
भारत को अब पूर्वी समुद्री क्षेत्र में अपनी रणनीति और क्षेत्रीय साझेदारियों को और मजबूत करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक और बुनियादी ढांचा सहयोग बढ़ाना भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा, ताकि क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखा जा सके।
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