नक्सलियों का खौफ रहे IPS कमलोचन कश्यप, रिटायरमेंट के बाद OSD बने

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए गए अभियानों की बात हो और आईपीएस कमलोचन कश्यप का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है। बस्तर अंचल में नक्सलियों के लिए आतंक का पर्याय बन चुके इस जांबाज अफसर ने अपने पूरे करियर का बड़ा हिस्सा नक्सल प्रभावित इलाकों में बिताया। हाल ही में सेवानिवृत्त होने के बाद भी सरकार ने उनके अनुभव पर भरोसा जताते हुए उन्हें पुलिस मुख्यालय में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (OSD) के रूप में नई जिम्मेदारी सौंपी है।

कमलोचन कश्यप मूल रूप से बस्तर जिले के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखते हैं। प्रारंभिक शिक्षा गांव और उच्च शिक्षा जगदलपुर कॉलेज से पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 1994 में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर डीएसपी के रूप में पुलिस सेवा की शुरुआत की। अपने शुरुआती कार्यकाल में उन्होंने खरगोन, उज्जैन, रायगढ़ और राजनांदगांव जैसे जिलों में एसडीओपी और सीएसपी के रूप में सेवाएं दीं।

अपने करियर के दौरान आईपीएस कश्यप की सबसे लंबी पोस्टिंग नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रही। गरियाबंद, बीजापुर, दंतेवाड़ा और राजनांदगांव जैसे संवेदनशील जिलों में उन्होंने नक्सल विरोधी अभियानों का नेतृत्व किया। बाद में इन्हीं इलाकों में वे डीआईजी के पद तक पहुंचे और 1 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्त हुए।

जब बस्तर में नक्सलवाद अपने चरम पर था, उस दौर में कमलोचन कश्यप ने निर्णायक कार्रवाई कर सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाया। दंतेवाड़ा में एसपी रहते हुए 78 मुठभेड़ों में 45 हार्डकोर नक्सलियों को ढेर किया गया। वहीं बीजापुर और राजनांदगांव में भी कई अभियानों के दौरान 30 से अधिक माओवादी मारे गए। उनकी कार्यशैली की खासियत रही—कम बोलना, सटीक रणनीति बनाना और प्रचार से दूर रहकर परिणाम पर फोकस करना।

स्थानीय निवासी होने के कारण उन्हें बस्तर की बोली और संस्कृति की गहरी समझ थी, जिससे नक्सल इलाकों में खुफिया जानकारी जुटाने और स्थानीय सहयोग बढ़ाने में मदद मिली। यही वजह रही कि उनके नाम से नक्सलियों में गहरी दहशत बनी रही।

आईपीएस कमलोचन कश्यप को उनकी सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक (सराहनीय सेवा), राष्ट्रपति पुलिस पदक (वीरता), राष्ट्रपति पुलिस पदक (विशिष्ट सेवा) और केंद्रीय गृहमंत्री दक्षता पदक जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है।

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