नई दिल्ली। भारत ने वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार की श्रेणी में चौथा स्थान प्राप्त किया है, जिसमें उसके आगे चीन, जापान और स्विटजरलैंड जैसे बड़े देश हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अनुसार, 27 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 704.885 बिलियन अमरीकी डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जो वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।
विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि के कारण
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में यह वृद्धि वैश्विक और घरेलू बाजारों में स्थिरता को दर्शाती है। आरबीआई का विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप मुख्य रूप से रुपये की विनिमय दर को स्थिर बनाए रखने और अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए होता है।
विदेशी मुद्रा भंडार का महत्व
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब अनुमानित आयात के एक वर्ष से अधिक को कवर करने में सक्षम है, जिससे वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के समय में घरेलू अर्थव्यवस्था की रक्षा की जा सकती है। इस रिजर्व का उच्च बफर घरेलू अर्थव्यवस्था को बाहरी संकटों से सुरक्षित रखने में सहायक है।
शीर्ष 3 देशों की स्थिति
- चीन: विश्व का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार वाला देश, जिसकी अर्थव्यवस्था में इसकी अहम भूमिका है।
- जापान: स्थिर विदेशी मुद्रा भंडार के साथ यह देश तकनीकी और आर्थिक मोर्चे पर विश्व में आगे है।
- स्विटजरलैंड: एक मजबूत अर्थव्यवस्था और वित्तीय स्थिरता के लिए स्विटजरलैंड का भंडार भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
रुपये की स्थिरता के लिए आरबीआई का हस्तक्षेप
आरबीआई का उद्देश्य विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता को रोकना है। हाल ही में रुपये की गिरावट के चलते आरबीआई ने बाजार में हस्तक्षेप किया, ताकि रुपये का मूल्य स्थिर बना रहे। इस तरह का हस्तक्षेप भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखने के लिए किया जाता है।