बस्तर, दुर्ग और धमतरी के वैद्यों की चिकित्सा पद्धतियों का दस्तावेजीकरण पूर्ण
छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड ने पारंपरिक वैद्यों की चिकित्सा पद्धतियों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
बस्तर, दुर्ग और धमतरी के 100 से अधिक वैद्यों की चिकित्सा पद्धतियों का दस्तावेजीकरण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। यह जानकारी देहरादून में औषधीय पौधों पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में साझा की गई।
संगोष्ठी में छत्तीसगढ़ का योगदान
छत्तीसगढ़ जलवायु परिवर्तन केंद्र की प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर डॉ. देवयानी शर्मा ने बताया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य जैव विविधता बोर्ड यह कार्य कर रहा है।
इसमें क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया और ट्रांस-डिसिप्लिनरी हेल्थ साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी का सहयोग मिल रहा है।
संजीवनी केंद्रों की पहल
वनमंत्री केदार कश्यप की पहल पर वन विभाग द्वारा संचालित संजीवनी केंद्रों में वैद्यों को मरीजों का उपचार करने के लिए स्थान दिया जा रहा है।
कुछ वैद्यों को उनकी सेवाओं के लिए पारिश्रमिक भी प्रदान किया जा रहा है।
वैद्यराज हेमचंद मांझी का योगदान
डॉ. शर्मा ने पद्मश्री वैद्यराज हेमचंद मांझी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने नारायणपुर जिले में पांच दशकों से पारंपरिक स्वास्थ्य सेवाओं में अमूल्य योगदान दिया है।
सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता
पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां गंभीर बीमारियों के इलाज में कारगर साबित हुई हैं।
साथ ही, ये सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता को मजबूत करती हैं।
प्रधानमंत्री की पहल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न के अनुरूप पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयुष मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय औषधीय पौधा बोर्ड द्वारा दसवीं विश्व आयुर्वेद कांग्रेस के हिस्से के रूप में आयोजित हुई थी।