बांग्लादेश की राजनीति में जिन नेताओं ने इतिहास रचा, उनमें खालिदा जिया का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की प्रमुख और देश की पूर्व प्रधानमंत्री रहीं खालिदा जिया का जीवन संघर्ष, धैर्य और नेतृत्व का प्रतीक रहा। भारत में जन्मी एक साधारण लड़की ‘पुतुल’ कैसे एक संप्रभु राष्ट्र की प्रधानमंत्री बनीं, यह कहानी अपने आप में बेहद प्रेरणादायक है।
खालिदा जिया का जन्म वर्ष 1945 में तत्कालीन बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के दिनाजपुर क्षेत्र में हुआ था। उनका मूल नाम खालिदा खानम था और परिवार उन्हें प्यार से ‘पुतुल’ कहकर बुलाता था। भारत विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान के हिस्से में चले गए पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में बस गया। उनके पिता इस्कन्दर अली मजूमदार चाय व्यवसाय से जुड़े हुए थे।
शिक्षा पूरी करने के बाद वर्ष 1960 में उनका विवाह पाकिस्तानी सेना के अधिकारी जियाउर रहमान से हुआ, जिसके बाद वे खालिदा जिया रहमान कहलाईं। विवाह के शुरुआती वर्षों में वे पूरी तरह पारिवारिक जीवन में रहीं और दो बेटों—तारिक रहमान तथा अराफात रहमान कोको—की परवरिश की। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान जब जियाउर रहमान स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे, तब खालिदा जिया को नजरबंद भी किया गया।
राजनीति में उनकी वास्तविक एंट्री उनके पति की हत्या के बाद हुई। जियाउर रहमान की मृत्यु के पश्चात जब बीएनपी कमजोर पड़ने लगी, तब खालिदा जिया ने पार्टी को पुनर्जीवित करने की जिम्मेदारी संभाली। कठिन परिस्थितियों, सैन्य शासन और लंबे आंदोलनों के बीच उन्होंने न केवल पार्टी को संगठित किया, बल्कि लोकतंत्र की बहाली के संघर्ष में भी अहम भूमिका निभाई।
उनके नेतृत्व में खालिदा जिया दो बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं—1991 से 1996 और 2001 से 2006 तक। इस दौरान उन्होंने एक सशक्त प्रशासक के रूप में अपनी पहचान बनाई। वे मुस्लिम देशों की चुनिंदा महिला प्रधानमंत्रियों में शामिल रहीं और दक्षिण एशिया की राजनीति में एक प्रभावशाली हस्ताक्षर बनकर उभरीं।
खालिदा जिया का जीवन इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ इच्छाशक्ति और नेतृत्व क्षमता से इतिहास रचा जा सकता है।