भारतीय मुक्केबाजी में छोटे लाल यादव का नाम खास पहचान रखता है। उन्होंने कई प्रतिभाशाली मुक्केबाजों को बेहतर प्रदर्शन के लिए तैयार किया। उनके प्रशिक्षण में मैरी कॉम सहित कई खिलाड़ियों ने उपलब्धियां हासिल कीं। अब उनके कोचिंग योगदान को द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की खबर है।
कोचिंग सफर ने दिलाई नई पहचान
मुक्केबाज के रूप में यादव ने लंबे समय तक राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा की। वह 2001 से 2012 तक राष्ट्रीय टीम का हिस्सा रहे। उन्होंने एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक भी जीता। इसके अलावा, वह 2008 से 2010 तक फेदरवेट वर्ग में राष्ट्रीय चैंपियन रहे।
2012 में पीठ की चोट ने उनका खिलाड़ी के रूप में सफर रोक दिया। इसके बाद उन्होंने प्रशिक्षण को अपना नया क्षेत्र बनाया। इसी दौरान उन्हें मैरी कॉम की तैयारी में सहयोग करने का अवसर मिला। यह उनके कोचिंग करियर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
उन्होंने 2014 में पटियाला स्थित राष्ट्रीय खेल संस्थान से कोचिंग डिप्लोमा पूरा किया। इसके बाद उन्होंने मैरी कॉम के साथ पूर्णकालिक रूप से काम किया। उनका जोर उम्र और शारीरिक क्षमता के अनुसार प्रशिक्षण तय करने पर रहा।
छोटे लाल यादव की कोचिंग रणनीति बनी खास
छोटे लाल यादव ने खिलाड़ियों की व्यक्तिगत जरूरतों को समझकर प्रशिक्षण दिया। मैरी कॉम के लिए उन्होंने कार्यभार प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया। इसका असर उनके प्रदर्शन में भी दिखाई दिया।
मैरी कॉम ने 2018 में एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। उसी वर्ष उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों और विश्व चैंपियनशिप में भी स्वर्ण हासिल किया। इससे यादव की प्रशिक्षण पद्धति को मजबूत पहचान मिली।
छोटे लाल यादव की प्रमुख उपलब्धियां
- राष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय तक मुक्केबाजी का अनुभव।
- एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने का रिकॉर्ड।
- मैरी कॉम के प्रशिक्षण दल का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे।
- भारतीय महिला मुक्केबाजों के प्रशिक्षण में योगदान दिया।
- राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों को तैयार किया।
चोट के बाद बदली भूमिका
खिलाड़ी के रूप में चोट के बाद यादव ने मुक्केबाजी नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी भूमिका बदलकर प्रशिक्षण की जिम्मेदारी संभाली। उनका अनुभव बाद में कई खिलाड़ियों के लिए उपयोगी साबित हुआ।
उन्होंने मैरी कॉम के अलावा अन्य भारतीय महिला मुक्केबाजों के साथ भी काम किया। उनके प्रशिक्षण से जुड़े खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लिया। बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया ने भी उन्हें कोचिंग भूमिकाओं में शामिल किया था।
द्रोणाचार्य पुरस्कार से जुड़ा सफर
द्रोणाचार्य पुरस्कार देश के प्रमुख खेल प्रशिक्षकों को दिया जाता है। यह सम्मान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खिलाड़ियों की उपलब्धियों में योगदान देने वाले प्रशिक्षकों को मिलता है। पुरस्कार की शुरुआत 1985 में हुई थी।
छोटे लाल यादव का नाम इस सम्मान के लिए पहले भी प्रस्तावित किया जा चुका है। 2020 में बॉक्सिंग फेडरेशन ने उनका नाम द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए भेजा था। उस समय वह महिला मुक्केबाजी से जुड़े प्रमुख प्रशिक्षकों में शामिल थे।
आगे ओलंपिक स्वर्ण पर नजर
यादव की नजर अब भारतीय मुक्केबाजी की अगली बड़ी उपलब्धियों पर है। उनका लक्ष्य खिलाड़ियों को ओलंपिक स्तर पर स्वर्ण पदक के लिए तैयार करना है। इसके लिए वह प्रशिक्षण और फिटनेस पर लगातार काम करने की बात कहते रहे हैं।
उनका सफर बताता है कि एक खिलाड़ी का अनुभव कोचिंग में बड़ी ताकत बन सकता है। रिंग में मिली सीख को उन्होंने प्रशिक्षण की रणनीति में बदला। इसलिए उनका योगदान भारतीय मुक्केबाजी के विकास से भी जुड़ा माना जाता है।
खेल जगत के लिए संदेश
- अच्छे प्रशिक्षक खिलाड़ियों की क्षमता को सही दिशा देते हैं।
- व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण प्रदर्शन सुधार सकता है।
- चोट के बाद भी खेल से जुड़कर नई भूमिका बनाई जा सकती है।
- भारतीय मुक्केबाजी में प्रशिक्षकों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हो रही है।
यह भी पढ़ें – राज्यपाल रमेन डेका ने असम सीएम से मुलाकात की