उज्जैन के श्री खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा चर्चा में है। मंदिर के बाहरी हिस्से को हटाया जा चुका है। हालांकि, प्रतिमा को विस्थापित करने का फैसला अभी नहीं हुआ है।
श्रद्धालु और संत समाज प्रतिमा को हटाने का विरोध कर रहे हैं। वहीं, प्रशासन ने वैज्ञानिक जांच कराने की बात कही है। विशेषज्ञों के अनुसार, रिपोर्ट मिलने के बाद ही आगे की प्रक्रिया तय होनी चाहिए।
प्रतिमा को सीधे हटाना क्यों हो सकता है जोखिम भरा?
खड़े हनुमान प्रतिमा की वास्तविक संरचना को समझना जरूरी है। इसके लिए मिट्टी और प्रतिमा के नीचे के हिस्से की जांच होगी।
विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रतिमा किस आधार पर स्थापित है, यह जानना अहम है। बिना जानकारी के मशीनों का इस्तेमाल नुकसान पहुंचा सकता है।
इसलिए पहले स्कैनिंग रिपोर्ट तैयार करना जरूरी माना जा रहा है। इसके बाद ही सुरक्षित विस्थापन की योजना बनाई जा सकती है।
खड़े हनुमान प्रतिमा पुरातत्व विशेषज्ञ ने पुराने अनुभव बताए
मंदसौर के सम्राट यशोधर्मन पुरातत्व संग्रहालय के संस्थापक कैलाशचंद्र पांडे ने अपनी राय रखी। उन्होंने कई बड़ी मूर्तियों के विस्थापन का अनुभव साझा किया।
उनके अनुसार, प्राचीन मूर्तियां अक्सर मजबूत आधार के साथ स्थापित होती थीं। उन्होंने मंदसौर में 12 फीट की सहस्त्र लिंग प्रतिमा का उदाहरण दिया।
उस प्रतिमा को आधार सहित दूसरी जगह स्थानांतरित किया गया था। इसलिए मूर्ति के साथ उसके आधार को समझना बेहद जरूरी है।
खड़े हनुमान प्रतिमा के विस्थापन में अपनाई जाती है विशेष प्रक्रिया
कैलाशचंद्र पांडे के अनुसार, पहले प्रतिमा के आसपास खुदाई की जाती है। इससे उसके आधार की वास्तविक स्थिति सामने आती है।
इसके बाद प्रतिमा के नीचे लकड़ी का मजबूत सहारा तैयार किया जाता है। फिर उसे धीरे-धीरे खिसकाकर बाहर निकालने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
ऐसी तकनीक से प्रतिमा को नुकसान का जोखिम कम किया जा सकता है। हालांकि, हर प्रतिमा के लिए प्रक्रिया अलग हो सकती है।
विशेषज्ञों ने स्कैनिंग रिपोर्ट को बताया जरूरी
खड़े हनुमान प्रतिमा को लेकर आर्किटेक्ट अतुल सेठ ने भी महत्वपूर्ण बात कही। उनके अनुसार, प्रतिमा की स्थापना की तकनीक पहले समझनी होगी।
उन्होंने कहा कि विकास कार्यों में कई बार मूर्तियों को स्थानांतरित किया जाता है। लेकिन हर प्रतिमा की संरचना और आधार अलग हो सकता है।
इसलिए मशीन से सीधे प्रतिमा हटाना उचित नहीं होगा। स्कैनिंग से नीचे की स्थिति समझने में मदद मिलेगी।
खड़े हनुमान प्रतिमा किस धातु की है, यह जानना भी जरूरी
अतुल सेठ ने प्रतिमा की धातु की जांच पर भी जोर दिया। इससे उसकी मजबूती का अनुमान लगाया जा सकता है।
धातु की जानकारी मिलने से विस्थापन की योजना बेहतर बनाई जा सकती है। साथ ही, संभावित जोखिमों का आकलन भी आसान होगा।
खड़े हनुमान प्रतिमा के मामले में यह जानकारी प्रशासन के लिए उपयोगी हो सकती है। इससे सुरक्षित प्रक्रिया चुनने में मदद मिलेगी।
क्या इसे चमत्कार से जोड़ना सही है?
पुरातत्व विशेषज्ञ कैलाशचंद्र पांडे ने एक अलग संभावना भी जताई। उन्होंने कहा कि पूरी तकनीकी प्रक्रिया के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।
यदि सभी वैज्ञानिक उपायों के बावजूद समस्या बनी रहती है, तो इसे अलग नजरिए से देखा जा सकता है। हालांकि, फिलहाल प्राथमिकता प्रतिमा की संरचना समझना है।
खड़े हनुमान प्रतिमा को लेकर श्रद्धालुओं की आस्था भी महत्वपूर्ण है। इसलिए प्रशासन को धार्मिक भावनाओं के साथ तकनीकी सुरक्षा का ध्यान रखना होगा।
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