नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले बड़ी सफलता मिली।
11 सदस्य देशों के बीच संयुक्त बयान पर सहमति बनी।
यह सहमति कई घंटे चली गहन बातचीत के बाद बनी।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, चर्चा सुबह करीब चार बजे तक चली।
भारत ने इस दौरान सभी सदस्य देशों से लगातार संवाद किया।
इस पूरी प्रक्रिया में ब्रिक्स कूटनीति की अहम भूमिका रही।
सहमति बनाना इसलिए चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि कई मुद्दे संवेदनशील थे।
सदस्य देशों के क्षेत्रीय हित भी एक जैसे नहीं हैं।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने मुश्किल और बढ़ाई।
इसके बावजूद भारत ने बातचीत का सिलसिला जारी रखा।
आखिरकार सभी सदस्य देशों के बीच साझा रास्ता तैयार हुआ।
चार बजे तक चली लंबी बातचीत
संयुक्त बयान को लेकर बातचीत शुक्रवार देर रात तक जारी रही।
यह चर्चा शनिवार सुबह करीब चार बजे तक चली।
इस दौरान कई संवेदनशील मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ।
भारत ने अलग-अलग देशों की चिंताओं को समझने की कोशिश की।
इसके बाद सहमति वाले मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाई गई।
कई दौर की चर्चा के बाद साझा रुख तैयार हुआ।
भारत ने बातचीत में टकराव के बजाय संवाद को प्राथमिकता दी।
इससे अलग-अलग विचार रखने वाले देशों को साथ लाने में मदद मिली।
यह ब्रिक्स कूटनीति की प्रभावी भूमिका का उदाहरण माना जा रहा है।
ईरान, सऊदी अरब और यूएई के बीच सहमति
ब्रिक्स में कई देशों के रणनीतिक हित अलग हैं।
ईरान, सऊदी अरब और यूएई इसका अहम उदाहरण हैं।
इन देशों के बीच कई क्षेत्रीय मुद्दों पर मतभेद रहे हैं।
पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति ने चुनौती बढ़ाई।
इसके बावजूद तीनों देशों ने साझा बयान पर सहमति दी।
भारत ने सभी पक्षों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा।
- क्षेत्रीय मतभेद: पश्चिम एशिया के मुद्दों पर अलग-अलग रुख रहे।
- भारत की पहल: सभी देशों की चिंताओं को बातचीत में शामिल किया गया।
- साझा सहमति: मतभेदों के बावजूद संयुक्त बयान पर रास्ता साफ हुआ।
भारत के लिए क्यों अहम है यह सफलता?
भारत इस वर्ष ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है।
ऐसे में संयुक्त बयान पर सहमति महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
इससे सम्मेलन की शुरुआत सकारात्मक माहौल में हुई।
भारत की कोशिश सभी सदस्य देशों को साथ लेकर चलने की रही।
संवेदनशील मुद्दों पर लगातार बातचीत को प्राथमिकता दी गई।
इससे मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने में मदद मिली।
ब्रिक्स कूटनीति के लिहाज से यह भारत की सक्रिय भूमिका दिखाती है।
साथ ही, इससे भारत की संवाद क्षमता भी सामने आती है।
यह सहमति भारत की अध्यक्षता के लिए भी अहम मानी जा रही है।
सम्मेलन में शामिल होंगे कई बड़े नेता
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है।
भारत 12 और 13 सितंबर को इसकी मेजबानी कर रहा है।
इसमें ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों के नेता शामिल होंगे।
इसके अलावा 10 पार्टनर देशों की भी भागीदारी है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सम्मेलन में शामिल होंगे।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी हिस्सा ले रहे हैं।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान भी सम्मेलन में मौजूद हैं।
कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी इसमें भाग ले रहे हैं।
इससे सम्मेलन का वैश्विक महत्व और बढ़ गया है।
संयुक्त बयान की सहमति का क्या मतलब?
संयुक्त बयान पर सहमति सम्मेलन के लिए अहम संकेत है।
यह दिखाता है कि मतभेदों के बीच संवाद संभव है।
सदस्य देश साझा मुद्दों पर एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।
भारत ने इस पूरी प्रक्रिया में समन्वय पर जोर दिया।
सभी पक्षों की चिंताओं को बातचीत का हिस्सा बनाया गया।
इससे साझा रुख तैयार करने में मदद मिली।
ब्रिक्स कूटनीति ने बनाया सहमति का रास्ता
भारत ने अलग-अलग हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की।
लगातार बातचीत ने सहमति तक पहुंचने का रास्ता तैयार किया।
इससे सम्मेलन से पहले साझा बयान पर सहमति बनी।
यही ब्रिक्स कूटनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
आगे किन मुद्दों पर होगी चर्चा?
संयुक्त बयान पर सहमति के बाद सम्मेलन का एजेंडा आगे बढ़ेगा।
सदस्य देश कई वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
आर्थिक सहयोग और राजनीतिक विषय भी एजेंडे में रहेंगे।
पार्टनर देशों के साथ सहयोग पर भी विचार हो सकता है।
वहीं, वैश्विक चुनौतियों पर साझा रुख बनाने की कोशिश होगी।
भारत की अध्यक्षता में सहयोग और संवाद पर जोर रहेगा।
- साझा एजेंडा: सदस्य देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाना।
- वैश्विक मुद्दे: आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों पर चर्चा।
- भारत की भूमिका: विभिन्न देशों के बीच संतुलन बनाए रखना।
कुल मिलाकर, संयुक्त बयान पर सहमति भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है।
ब्रिक्स कूटनीति ने कठिन परिस्थितियों में संवाद की ताकत दिखाई।
11 देशों की सहमति ने सम्मेलन की शुरुआत मजबूत कर दी।
अब इस सहमति को ठोस सहयोग में बदलना अगली चुनौती होगी।
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