बिहार वोटर लिस्ट विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंच चुका है।
राज्य में वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण को लेकर भारी राजनीतिक हलचल बनी हुई है।
9 जुलाई को विपक्षी दलों ने पटना में जोरदार प्रदर्शन किया था,
और 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई शुरू की।
याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट की चुनौती
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता से सवाल किया,
“चुनाव आयोग कैसे गलत है, यह साबित करके बताइए!”
चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि अभी तक सभी याचिकाओं की प्रतियां नहीं मिलीं,
इसलिए उनका पक्ष पूरी तरह से रखना कठिन हो रहा है।
याचिकाकर्ता की दलील
गोपाल शंकरनारायणन ने आयोग की प्रक्रिया को ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ कहे जाने पर आपत्ति जताई।
उन्होंने कहा कि 2003 की तुलना में अब वोटरों की संख्या कई गुना अधिक है,
लेकिन प्रक्रिया तेजी से चलाई जा रही है,
जिससे कई मतदाता प्रभावित हो सकते हैं।
पांच बड़े संवैधानिक सवाल
1. संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन
विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया अनुच्छेद 14, 19, 21, 325, 326 और RP एक्ट का उल्लंघन करती है।
2. नागरिकता पर मनमानी
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि दस्तावेजों की अनिवार्यता नागरिकता के अधिकार को चुनौती देती है।
3. लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आघात
वोटर सत्यापन प्रक्रिया को लोकतंत्र की बुनियादी भावना के खिलाफ बताया गया है।
4. गरीबों पर असमान बोझ
प्रवासी, महिलाएं और वंचित समूहों पर अनावश्यक दस्तावेजी दबाव डाला जा रहा है।
5. गलत समय पर कार्रवाई
RJD ने आरोप लगाया कि यह पूरी प्रक्रिया गलत समय पर शुरू हुई है,
जिससे करोड़ों लोग मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि 2003 की वोटर लिस्ट में जिनके नाम हैं,
उन्हें कोई नया दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं है।
जिनके माता-पिता के नाम सूची में हैं, उन्हें केवल जन्म प्रमाण से संबंधित दस्तावेज देना होगा।
आयोग ने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार की जा रही है।