वीर सावरकर पुरस्कार को लेकर देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस सम्मान को स्वीकार करने से साफ इनकार करते हुए कहा कि मेरी अनुमति के बिना नाम घोषित करना आयोजकों की गंभीर और गैरजिम्मेदाराना गलती है। थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि वे वी.डी. सावरकर के नाम पर दिए जाने वाले किसी भी पुरस्कार को स्वीकार नहीं करेंगे और न ही इससे जुड़े किसी कार्यक्रम में शामिल होंगे।
इस बीच, पुरस्कार देने वाली संस्था हाई रेंज रूरल डेवलपमेंट सोसाइटी (एचआरडीएस इंडिया) ने बड़ा दावा किया है कि थरूर को पहले ही इसकी जानकारी दे दी गई थी। संस्था के सचिव अजी कृष्णन के अनुसार, जूरी सदस्य थरूर से उनके आवास पर मिले थे और उन्होंने अन्य पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की सूची भी मांगी थी। संस्था का कहना है कि कांग्रेस के दबाव के कारण थरूर पीछे हटे हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर थरूर ने लिखा कि पुरस्कार के उद्देश्य और आयोजक संगठन के बारे में स्पष्ट जानकारी न होने के कारण वे यह सम्मान स्वीकार नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि उन्हें मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से ही पता चला कि स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान वे इस पुरस्कार के लिए नामांकित किए गए हैं।
दूसरी ओर, भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री मुरलीधरन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी कांग्रेस सदस्य को वीर सावरकर के नाम पर पुरस्कार नहीं लेना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि सावरकर के खिलाफ कांग्रेस की ऐतिहासिक राय के चलते यह सम्मान स्वीकार करना पार्टी के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकता है।
इस विवाद ने सावरकर की विचारधारा, राजनीतिक मतभेदों और कांग्रेस–भाजपा के बीच चल रही वैचारिक लड़ाई को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे की गूंज लगातार बढ़ रही है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और भी तूल पकड़ सकता है।