भारत की पारंपरिक संस्कृति में वृक्षों को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवित देवता माना जाता है। इसी आस्था का विस्तार है — ‘वृक्ष विवाह’, जो कई राज्यों में मनाया जाता है, विशेषकर छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में।
पीपल-बरगद का विवाह क्यों?
भारतीय मान्यताओं के अनुसार पीपल को भगवान विष्णु और बरगद को भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। इन वृक्षों की शादी कराना दिव्य शक्ति के मिलन का प्रतीक होता है।
विवाह की विधियां मानव जैसी होती हैं
इस विवाह में पूरे रीति-रिवाज निभाए जाते हैं — मंडप सजता है, बारात निकलती है, कन्यादान होता है और फेरे भी होते हैं। महिलाएं मेहंदी लगाती हैं और विवाह गीत गाती हैं।
धार्मिक महत्व और सौभाग्य की कामना
ऐसी मान्यता है कि वृक्ष विवाह करवाने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। विशेषकर कुंवारी कन्याएं यह विवाह करवाकर अपने लिए शुभ जीवनसाथी की कामना करती हैं।
पर्यावरण से जुड़ा गहरा संदेश
यह परंपरा केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना की मिसाल भी है। विवाह के बाद वृक्षों को पूजनीय मानकर संरक्षित किया जाता है। कोई उन्हें काटता नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करता है।
छत्तीसगढ़ समेत भारत के कई हिस्सों में जीवित परंपरा
छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह परंपरा आज भी जीवित है। गांवों में वृक्षों की शादी सामूहिक आयोजन के रूप में होती है।
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