मंगल आज सूखा और ठंडा ग्रह है. फिर भी उसकी चट्टानों में पुराने पानी की यादें दर्ज हैं. नासा के पर्सिवियरेंस रोवर से जुड़े नए शोध ने जेज़ेरो क्रेटर में पानी का इतिहास पहले से ज़्यादा उलझा हुआ दिखाया है. इस लेख में समझिए कि वैज्ञानिक चट्टानों से यह कहानी कैसे पढ़ते हैं.
जेज़ेरो क्रेटर में पानी कितनी बार आया
शोध के मुताबिक जेज़ेरो क्रेटर में पानी कम से कम तीन अलग रूपों में आया. पहले कार्बन डाइऑक्साइड वाले भूजल ने दरारों में कार्बोनेट जमाया. फिर संभवतः झील से जुड़े पानी ने सिलिका बनाई. आखिर में गर्म भूजल ने फ्लोराइट और कैल्शियम सल्फेट की नसें छोड़ीं. यह सब मार्जिन यूनिट नाम की चट्टानी पट्टी में हुआ.
शोध से जुड़े तथ्य एक नज़र में
- शोध पत्र: ओलिवीन से भरपूर मार्जिन यूनिट में झील और भूजल से जुड़ा बदलाव.
- जर्नल: Communications Earth & Environment, सितंबर 2026.
- लीड लेखक: कैंडिस बेडफोर्ड, पर्ड्यू यूनिवर्सिटी, अमेरिका.
- आंकड़ा: सुपरकैम से 185 से ज़्यादा चट्टानी टारगेट की जांच.
जेज़ेरो क्रेटर और मार्जिन यूनिट क्या हैं
जेज़ेरो मंगल पर एक बड़ा गड्ढा है, जो किसी पुरानी टक्कर से बना था. अरबों साल पहले इसमें एक झील थी. वहीं इसमें एक नदी भी आकर गिरती थी. इसीलिए पर्सिवियरेंस फरवरी 2021 में यहीं उतारा गया.
मार्जिन यूनिट क्रेटर की अंदरूनी दीवार के साथ फैली चट्टानों की पट्टी है. नासा के मुताबिक वैज्ञानिकों को यहां झील किनारे की तलछटी परतें मिलने की उम्मीद थी. हालांकि रोवर को यहां आग्नेय चट्टानें मिलीं. आग्नेय चट्टान यानी पिघले पदार्थ के ठंडा होने से बनी चट्टान.
खनिज कैसे बनते हैं पानी की डायरी
दरअसल कुछ खनिज सिर्फ पानी की मौजूदगी में ही बनते हैं. इसलिए वे बीते समय की डायरी जैसे होते हैं. मार्जिन यूनिट की चट्टानों में ओलिवीन भरपूर है. यह हरे रंग का खनिज मैग्नीशियम और लोहे से बना होता है. आमतौर पर पानी लगते ही ओलिवीन बदलने लगता है.
कार्बोनेट: ठंडे भूजल की निशानी
अगर पानी में कार्बन डाइऑक्साइड घुली हो, तो ओलिवीन से कार्बोनेट बनता है. नासा के मुताबिक यह कार्बोनेट दरारों में और निचले हिस्सों में ज़्यादा मिला. यानी पहले दौर का पानी ज़मीन के नीचे से आया.
सिलिका: झील की संभावित छाप
इसके बाद सिलिका का पैटर्न अहम रहा. नासा के मुताबिक सिलिका पुरानी झील की जल रेखा के नीचे ज़्यादा मिली. इसी आधार पर इस दौर को झील से जोड़ा गया है. फिर भी नासा ने इस संबंध को पक्का नहीं, बल्कि संभावित बताया है.
फ्लोराइट: गर्म पानी का सबूत
आखिर में फ्लोराइट और कैल्शियम सल्फेट की नसें मिलीं. Sci.News के मुताबिक ये नसें बाद में बनी दरारों में भरी हैं. इसका मतलब है कि यह दौर सबसे आखिर में आया. नासा के मुताबिक फ्लोराइट ज़मीन के नीचे गर्म पानी के घूमने का संकेत है.
दौरों का क्रम कैसे तय होता है
भूविज्ञान में एक आसान नियम चलता है. जो दरार किसी दूसरी चट्टान या नस को काटती है, वह उससे बाद में बनी होती है. ठीक वैसे ही जैसे दीवार पर पड़ी नई दरार पुराने पेंट को चीरती है. इसी तर्क से वैज्ञानिक बताते हैं कि कौन सा पानी पहले आया और कौन बाद में. ऐसे में फ्लोराइट वाली नसें सबसे नई कड़ी मानी गईं.
सुपरकैम से चट्टान कैसे पढ़ी जाती है
सबसे पहले जान लें कि सुपरकैम रोवर के मस्तूल पर लगा उपकरण है. फिर यह दूर से चट्टान पर लेज़र मारता है. इससे चट्टान का बहुत छोटा हिस्सा गर्म होकर चमकता है. इसके बाद उस चमक के रंगों से चट्टान के तत्व पहचाने जाते हैं. नासा के मुताबिक यह करीब 21 फीट दूर तक काम कर सकता है.
साथ ही रोवर ने करीब 265 मीटर ऊंचाई के अंतर वाले इलाके की जांच की. इस तरह ऊंचाई और खनिज का मिलान करके जेज़ेरो क्रेटर में पानी के अलग-अलग दौर तय हुए.
रहने लायक माहौल की तलाश में इसका महत्व
नासा के मुताबिक ओलिवीन और पानी की प्रतिक्रिया में हाइड्रोजन बनती है. उदाहरण के लिए धरती पर कुछ सूक्ष्म जीव ऐसी हाइड्रोजन से ऊर्जा पाते हैं. इसके अलावा कार्बोनेट और सिलिका जीवन के रासायनिक निशान बचाकर रख सकते हैं. यही वजह है कि ये चट्टानें वैज्ञानिकों के लिए खास हैं.
लीड लेखक कैंडिस बेडफोर्ड ने मार्जिन यूनिट को पानी के अलग-अलग तंत्रों का चौराहा कहा है. सीधे शब्दों में कहें तो यहां भूजल, झील का पानी और गर्म तरल, तीनों का असर पड़ा.
मार्जिन यूनिट पर पाठकों के सवाल
क्या जेज़ेरो क्रेटर में पानी आज भी है?
नहीं. यह शोध अरबों साल पुराने बदलावों के बारे में है. आज वहां तरल पानी की कोई बात इस शोध में नहीं है.
इस खोज से जीवन का सबूत मिला क्या?
नहीं. शोध सिर्फ यह बताता है कि यहां ऐसे हालात रहे, जिनमें जीवन संभव हो सकता था.
पर्सिवियरेंस रोवर कब से मंगल पर है?
यह रोवर फरवरी 2021 में जेज़ेरो क्रेटर में उतरा था. तब से यह वहां की चट्टानों की जांच कर रहा है.
नोट: यह लेख नासा की जानकारी और प्रकाशित शोध से जुड़ी रिपोर्टों पर आधारित है. नतीजे रोवर के उपकरणों की दूर से की गई जांच पर टिके हैं. झील वाले दौर को अभी संभावित माना गया है, और पक्के जवाब के लिए नमूनों की प्रयोगशाला जांच ज़रूरी होगी.
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