द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने भारत को बिना सहमति युद्ध में शामिल कर लिया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया। नेताओं का कहना था कि गुलाम देश से लोकतंत्र बचाने की उम्मीद उचित नहीं है। जानिए, आखिर कैसे ‘भारत छोड़ो आंदोलन‘ बना आजादी की लड़ाई का सबसे बड़ा नारा?
इसी बीच जापान की सैन्य बढ़त ने ब्रिटेन की चिंता बढ़ा दी। भारत की सुरक्षा चुनौती बन गई। ब्रिटिश सरकार भारतीय नेताओं का समर्थन चाहती थी। हालांकि भारतीय नेतृत्व तत्काल सत्ता हस्तांतरण चाहता था।
भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत क्यों हुई?
मार्च 1942 में क्रिप्स मिशन भारत आया। ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के बाद सीमित अधिकार देने का प्रस्ताव रखा। कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया। महात्मा गांधी ने इस प्रस्ताव को “पोस्ट डेटेड चेक” बताया।
इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने ब्रिटिश शासन समाप्त करने की मांग तेज कर दी। आखिरकार 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ।
भारत छोड़ो आंदोलन का देशभर में प्रभाव
9 अगस्त की सुबह ही महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश सरकार को लगा कि आंदोलन रुक जाएगा। लेकिन जनता स्वतः सड़कों पर उतर आई।
देशभर में हड़तालें हुईं। कई शहरों में प्रदर्शन शुरू हुए। गांवों तक आंदोलन फैल गया। बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में इसका व्यापक असर दिखाई दिया।

आंदोलन की प्रमुख विशेषताएं
- गांधीजी ने “करो या मरो” का संदेश दिया।
- कांग्रेस ने अंग्रेजों से तत्काल भारत छोड़ने की मांग की।
- नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जनता ने आंदोलन संभाला।
- कई स्थानों पर समानांतर सरकारें बनीं।
- महिलाओं ने आंदोलन में महत्वपूर्ण नेतृत्व निभाया।
महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका
अरुणा आसफ अली ने ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया। उषा मेहता ने गुप्त कांग्रेस रेडियो चलाकर संदेश पहुंचाए। सुचेता कृपलानी ने भूमिगत कार्यकर्ताओं का समन्वय किया। मातंगिनी हाजरा ने तिरंगा हाथ में लेकर बलिदान दिया।
महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को नई दिशा और मजबूती दी।
अंग्रेजी शासन की कड़ी कार्रवाई
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कीं। कई जगह पुलिस ने गोलीबारी की। हजारों लोग घायल हुए। बड़ी संख्या में स्वतंत्रता सेनानियों को जेल भेजा गया।
इसके बावजूद जनआंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। लोगों का विरोध लगातार जारी रहा।
एक नजर में
- 8 अगस्त 1942 को आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ।
- गांधीजी ने “करो या मरो” का नारा दिया।
- 9 अगस्त को शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी हुई।
- कई राज्यों में समानांतर सरकारें बनीं।
- महिलाओं ने आंदोलन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
- यह आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़ बना।
क्यों माना जाता है ऐतिहासिक मोड़?
इतिहासकारों का मानना है कि इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। इसके बाद आजाद हिंद फौज, नौसेना विद्रोह और युद्ध के बाद की परिस्थितियों ने स्वतंत्रता की राह आसान बनाई। इसलिए भारत छोड़ो आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निर्णायक अध्यायों में गिना जाता है। इस जनआंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब स्वतंत्रता से कम किसी समझौते के लिए तैयार नहीं था।
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