रायपुर में आयोजित राज्य स्तरीय परामर्श कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि आर्द्रभूमि संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं बल्कि जल सुरक्षा, जैव विविधता और स्थानीय आजीविका से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। छत्तीसगढ़ राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण और फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में विभिन्न विभागों, पंचायत प्रतिनिधियों, शोध संस्थानों और स्वयंसेवी संगठनों ने भाग लेकर संरक्षण की दिशा में साझा रणनीति पर चर्चा की।
जल संरक्षण और जैव विविधता पर विशेष फोकस
कार्यक्रम में बताया गया कि आर्द्रभूमि संरक्षण से जल संसाधनों की सुरक्षा, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता के संरक्षण को मजबूती मिलती है। सदस्य सचिव मथेश्वरन वी. ने कहा कि राज्य में जियो टैगिंग, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और रामसर स्थलों की पहचान जैसे कार्यों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सराहनीय रही है। उन्होंने नागरिकों को संरक्षण अभियानों का सक्रिय भागीदार बनाने की आवश्यकता बताई।
जल प्रबंधन के लिए समग्र दृष्टिकोण जरूरी
विशेषज्ञों ने कहा कि आर्द्रभूमि संरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए ‘रिज टू वैली’ दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। एफईएस की अध्ययन प्रमुख प्रतीति प्रियदर्शिनी ने जल को साझा प्राकृतिक संसाधन बताते हुए परिदृश्य स्तर पर समग्र प्रबंधन की वकालत की। उन्होंने जल संरक्षण से जुड़े संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय और सहयोग को समय की आवश्यकता बताया।
स्थानीय समुदायों की भूमिका सबसे अहम
बैठक में प्रस्तुत अध्ययन निष्कर्षों में बताया गया कि आर्द्रभूमि संरक्षण तभी सफल हो सकता है जब स्थानीय समुदायों को निगरानी, संरक्षण और प्रबंधन प्रक्रियाओं में औपचारिक रूप से शामिल किया जाए। विशेषज्ञों ने ग्राम पंचायतों, जैव विविधता प्रबंधन समितियों और स्वयं सहायता समूहों की भूमिका को और मजबूत करने पर बल दिया। इससे संरक्षण प्रयासों को स्थायित्व और व्यापक जनसमर्थन मिलेगा।
संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की तैयारी
परामर्श कार्यक्रम में कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए, जिनमें नागरिक विज्ञान को बढ़ावा देना, महिलाओं और युवाओं को नेतृत्वकारी भूमिका देना तथा पंचायतों को अधिक सशक्त बनाना शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्द्रभूमि संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देकर जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।
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