पश्चिम बंगाल चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की बढ़त के पीछे एक सुनियोजित और बेहद आक्रामक रणनीति का हाथ माना जा रहा है, जिसकी कमान खुद केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने संभाली। ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले शाह ने चुनाव से पहले 15 दिनों तक बंगाल में डेरा डालकर न सिर्फ प्रचार किया, बल्कि एक मजबूत ‘वॉर रूम मॉडल’ के जरिए पूरे चुनाव अभियान को जमीन से जोड़ा।
इस दौरान शाह ने 50 से अधिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, जिसमें जनसभाएं, रोड शो और देर रात तक चलने वाली संगठनात्मक बैठकें शामिल थीं। खास बात यह रही कि उनका फोकस केवल बड़ी रैलियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने उन सीटों पर विशेष ध्यान दिया जिन्हें जीतने योग्य या कड़ी टक्कर वाली माना गया था। हर क्षेत्र के लिए अलग रणनीति तैयार की गई और रात 1-2 बजे तक कार्यकर्ताओं के साथ समीक्षा बैठकों का सिलसिला चलता रहा।
भाजपा की रणनीति का सबसे मजबूत पक्ष बूथ स्तर पर माइक्रो-मैनेजमेंट रहा। ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल के जरिए हर मतदाता तक पहुंच बनाने की कोशिश की गई। उम्मीदवारों के चयन में भी स्थानीय प्रभाव और संगठन की पकड़ को प्राथमिकता दी गई। हर बूथ पर 200-300 वोट जुटाने का लक्ष्य तय किया गया, जिससे चुनावी गणित को जमीनी स्तर पर मजबूत किया जा सके।
2021 की हार के बाद भाजपा ने अपने संगठन में व्यापक बदलाव किए। दलबदलुओं और सेलेब्रिटी उम्मीदवारों पर निर्भरता कम करते हुए स्थानीय चेहरों को आगे बढ़ाया गया। साथ ही पार्टी ने अपने चुनावी नैरेटिव में भी बदलाव किया। इस बार व्यक्तिगत हमलों से दूरी बनाते हुए मुद्दों को केंद्र में रखा गया और हिंदुत्व को नए अंदाज में पेश किया गया।
चुनाव प्रचार के दौरान सुरक्षा, घुसपैठ और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया। साथ ही यह सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया कि मतदाता सूची में कोई फर्जी वोटर न रहे और अधिकतम मतदान सुबह के शुरुआती घंटों में ही हो जाए।
कुल मिलाकर, Amit Shah की रणनीति ने यह साफ कर दिया कि आधुनिक चुनाव केवल रैलियों से नहीं, बल्कि डेटा, संगठन और बूथ स्तर की पकड़ से जीते जाते हैं। बंगाल में भाजपा की बढ़त इसी रणनीतिक बदलाव और सटीक क्रियान्वयन का नतीजा मानी जा रही है।