Supreme Court of India ने अपनी रजिस्ट्री के कामकाज पर कड़ी नाराजगी जताते हुए प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली को “नैस्टी” बताते हुए कहा कि कुछ अधिकारी खुद को “सुपर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया” समझने लगे हैं। यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब कोर्ट एक हाई-प्रोफाइल निवेश घोटाले से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहा था।
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने पाया कि अदालत के पूर्व आदेश की गलत व्याख्या की गई। खासतौर पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) को नोटिस जारी न करना कोर्ट को गंभीर चूक लगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि 23 मार्च के आदेश में ED को पक्षकार बनाकर नोटिस जारी करना जरूरी था और अब तत्काल नोटिस भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
मामला आयुषी मित्तल उर्फ आयुषी अग्रवाल और उनके पति से जुड़े कथित 37,000 करोड़ रुपये के निवेश घोटाले से संबंधित है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि इस तरह की प्रशासनिक लापरवाही न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल को पूरे मामले की तथ्यात्मक जांच करने का आदेश दिया है।
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत याचिका पर विचार करने से पहले याचिकाकर्ता और उसके परिवार की सभी चल-अचल संपत्तियों का पूरा ब्योरा देना अनिवार्य होगा। अदालत ने विस्तृत हलफनामा दाखिल करने के निर्देश देते हुए कहा कि संपत्तियों की पारदर्शिता सुनिश्चित होने के बाद ही आगे की सुनवाई की जाएगी।
इस मामले की अगली सुनवाई मई में निर्धारित की गई है। सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा रुख न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।