छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में खनिज आधारित गतिविधियों को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में नई पहल शुरू हुई है। बीजापुर जिले के कुचनूर क्षेत्र में करीब 25 वर्षों बाद कोरंडम खदान का दोबारा संचालन शुरू किया गया है। अब खनिज के उत्खनन के साथ उसके प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड का उद्देश्य कोरंडम की पूरी वैल्यू चेन विकसित करना है। इसमें खनन से लेकर कटिंग, पॉलिशिंग, आभूषण निर्माण, ब्रांडिंग और विपणन तक की गतिविधियां शामिल होंगी।
विश्वविद्यालय बनेगा नॉलेज पार्टनर
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मौजूदगी में सीएमडीसी और पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के बीच समझौता हुआ। इसके तहत विश्वविद्यालय को नॉलेज पार्टनर बनाया गया है।
समझौते के माध्यम से स्थानीय युवाओं और शिल्पकारों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें जेमस्टोन हैंडलिंग, कटिंग और पॉलिशिंग जैसी गतिविधियों में दक्ष बनाने की योजना है।
कोरंडम खनन के साथ कौशल विकास पर जोर
कोरंडम खनन को केवल उत्खनन तक सीमित नहीं रखा जाएगा। स्थानीय स्तर पर इससे जुड़े कौशल को विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रशिक्षण मिलने से युवाओं के लिए रोजगार के साथ स्वरोजगार के अवसर भी बन सकते हैं। इसके अलावा, स्थानीय शिल्पकारों को नई तकनीक और बाजार से जोड़ने में मदद मिलेगी।
कुचनूर में फिर शुरू हुआ खनन
बीजापुर के भोपालपट्टनम क्षेत्र के ग्राम कुचनूर में कोरंडम खदान का संचालन किया जा रहा है। करीब 25 वर्ष के अंतराल के बाद फरवरी 2025 से यहां काम फिर शुरू हुआ।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, खदान से करीब 240 किलोग्राम कोरंडम का भंडारण है। इसमें से 157.643 किलोग्राम सामग्री का परिवहन किया जा चुका है।
परिवहन किए गए खनिज में 107.989 किलोग्राम बी-ग्रेड और 49.654 किलोग्राम औद्योगिक ग्रेड कोरंडम शामिल है। उत्खनन वैज्ञानिक पद्धति से किए जाने की जानकारी दी गई है।
स्थानीय युवाओं के लिए बढ़ेंगे अवसर
कुचनूर खदान के संचालन से बीजापुर के 14 स्थानीय युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिले हैं। सरकार की योजना खनिज आधारित गतिविधियों में स्थानीय भागीदारी बढ़ाने की है।
इसमें युवा, शिल्पकार, स्वयं सहायता समूह और स्थानीय उद्यमी शामिल हो सकते हैं। इससे खनिज संपदा से मिलने वाला आर्थिक लाभ स्थानीय स्तर पर बढ़ाने की संभावना है।
‘बस्तर ब्रांड’ से बाजार तक पहुंचेगा कोरंडम
कुचनूर से मिलने वाले उच्च गुणवत्ता वाले कोरंडम को ‘बस्तर ब्रांड’ से जोड़ने की योजना है। इसके तहत स्थानीय डिजाइन, गुणवत्ता और प्रामाणिकता को महत्व दिया जाएगा।
कोरंडम से आभूषण और रत्न उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इन उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग के जरिए नए बाजार विकसित करने का प्रयास होगा।
कोरंडम खनन से प्राप्त संसाधन को स्थानीय उत्पादों में बदलने पर अधिक मूल्य प्राप्त हो सकता है। इससे बस्तर की कला, शिल्प और खनिज संपदा को एक साथ बाजार से जोड़ने का अवसर मिलेगा।
नए क्षेत्रों में अन्वेषण की तैयारी
बीजापुर जिले में कोरंडम के संभावित नए क्षेत्रों की पहचान का काम जारी है। भोपालपट्टनम क्षेत्र के अन्य इलाकों में भी अन्वेषण और पूर्वेक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
धनगोल सहित विभिन्न संभावित क्षेत्रों को लेकर भी कार्रवाई की जा रही है। इसका उद्देश्य भविष्य में खनिज आधारित गतिविधियों के विस्तार की संभावनाएं तलाशना है।
पारदर्शी नीलामी से बढ़ेगा राजस्व
उत्खनित कोरंडम की पारदर्शी नीलामी से राज्य सरकार को राजस्व मिलने की संभावना है। साथ ही, बस्तर के कोरंडम को बड़े बाजार तक पहुंचाने का अवसर मिल सकता है।
सरकार का जोर खनिज संसाधनों के वैज्ञानिक और सतत उपयोग पर है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
कोरंडम खनन से वैल्यू चेन को मिलेगी मजबूती
कोरंडम खनन के बाद कटिंग, पॉलिशिंग और आभूषण निर्माण जैसी गतिविधियां प्रदेश में ही विकसित करने की योजना है। इससे कच्चे खनिज के बजाय तैयार उत्पादों का बाजार तैयार हो सकता है।
वहीं, स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण मिलने से कौशल आधारित रोजगार बढ़ने की संभावना है। स्टार्टअप और छोटे उद्यम भी इस क्षेत्र से जुड़ सकते हैं।
बस्तर की खनिज संपदा को मिलेगी नई पहचान
बस्तर प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक कला के लिए जाना जाता है। कोरंडम को स्थानीय ब्रांड से जोड़ने की पहल इस पहचान को आर्थिक अवसर में बदल सकती है।
इसके अलावा, गुणवत्ता वाले रत्न उत्पाद तैयार होने पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच बनाने की संभावना बढ़ेगी। स्थानीय समुदायों की भागीदारी इस पूरी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना सकती है।
मुख्य बातें
- बीजापुर के कुचनूर में करीब 25 वर्ष बाद कोरंडम खदान शुरू हुई।
- फरवरी 2025 से खनन गतिविधियां दोबारा संचालित हैं।
- सीएमडीसी और पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के बीच एमओयू हुआ।
- विश्वविद्यालय को नॉलेज पार्टनर बनाया गया है।
- स्थानीय युवाओं और शिल्पकारों को आधुनिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
- ‘बस्तर ब्रांड’ के तहत रत्न और आभूषण उत्पाद विकसित करने की योजना है।
इससे क्या होगा फायदा?
- स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे।
- कौशल आधारित स्वरोजगार को बढ़ावा मिलेगा।
- खनिजों का स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन होगा।
- बस्तर के उत्पादों को बाजार से जोड़ने में मदद मिलेगी।
- राज्य के राजस्व में वृद्धि की संभावना बनेगी।
- स्थानीय कला और खनिज संपदा की पहचान मजबूत हो सकती है।
कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ में कोरंडम खनन को स्थानीय आर्थिक विकास से जोड़ने की दिशा में पहल की जा रही है। सरकार का प्रयास खनिज निकालने के साथ पूरी वैल्यू चेन विकसित करना है।
कटिंग, पॉलिशिंग, आभूषण निर्माण और ब्रांडिंग जैसी गतिविधियों से स्थानीय स्तर पर नए आर्थिक अवसर बन सकते हैं। वहीं, विश्वविद्यालय के सहयोग से प्रशिक्षण मिलने पर युवाओं की भागीदारी बढ़ सकती है।
यह पहल बस्तर की खनिज संपदा को रोजगार, कौशल विकास और स्थानीय उद्यमिता से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
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